
जब शब्द थम जाते हैं, भाव बोलते हैं,
वहीं कहीं तुम मिलते हो, गुरुदेव—
हर उस पंक्ति में, जहाँ आत्मा झलकती है,
हर उस गीत में, जहाँ जीवन धड़कता है।
तुम केवल कवि नहीं थे,
तुम युग की चेतना थे,
एक दीपक जो अंधकार में भी
स्वयं जलकर राह दिखाता था।
बंगाल की मिट्टी से उठी वो सुगंध,
जिसने पूरे विश्व को महकाया,
तुम्हारी लेखनी ने सीमाओं को तोड़ा,
और मानवता का संदेश फैलाया।
“गीतांजलि” के पन्नों में छुपा,
एक अनोखा आध्यात्मिक स्वर,
जिसे पढ़कर हर हृदय ने जाना,
ईश्वर बसता है हर अंदर।
शांति निकेतन की शांत छाया में,
तुमने शिक्षा को नया अर्थ दिया,
किताबों से परे, जीवन से जोड़कर,
ज्ञान का सच्चा पथ दिखा दिया।
प्रकृति तुम्हारी सहेली थी,
नदी, पवन, और हरियाली,
हर एक दृश्य में तुमने पाया,
जीवन की गहरी खुशहाली।
तुम्हारी कविता में प्रेम था,
न कोई भेद, न कोई दीवार,
मानव-मानव एक समान हो,
यही था तुम्हारा सच्चा विचार।
जब देश गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा,
तब तुम्हारी कलम बनी तलवार,
स्वाभिमान की ज्वाला जगा कर,
तुमने किया जन-जन को तैयार।
नहीं चाहा तुमने कोई ताज,
न ही सत्ता का कोई मान,
बस चाहते थे एक ऐसा भारत,
जहाँ हो स्वतंत्रता और सम्मान।
तुम्हारी धुनों में बसा वो जादू,
जो आज भी दिलों को छू जाता है,
हर सुर में छुपी वो भावना,
जो जीवन को नया अर्थ दे जाता है।
गुरुदेव, तुम अमर हो,
समय से परे, सीमाओं से दूर,
तुम्हारी रचनाएँ हैं वो उजाला,
जो हर युग में करता है नूर।
आज भी जब कोई मन से लिखता है,
जब कोई सच्चाई को अपनाता है,
वहाँ कहीं तुम्हारी छवि दिखती है,
जो हर दिल को प्रेरित कर जाती है।
तुम एक नाम नहीं, एक विचार हो,
जो हर पीढ़ी में जीवित रहता है,
भारत की आत्मा में बसकर,
हर युग को आलोकित करता है।
कृष्णा कान्त कपासिया












