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माँ

मेरे हदयतल, स्वांस,मन तन और विचार की प्रथम प्रेरणा ऊर्जा, परम आदरणीया नेह वात्सल्य मूर्ति, प्राण ऊर्जा बिंदु माँ

तुम्हारा नाम लेते ही साँसों में सुगंध उतर आती है माँ। तुम कोई शब्द नहीं हो, तुम तो ब्रह्मांड की पहली धड़कन हो। तुमसे पहले न सुबह थी न शाम, न धरती थी न आकाश। जब ईश्वर ने सृष्टि रचनी चाही तो सबसे पहले तुम्हारी ममता गढ़ी, फिर उसी ममता की छाँव में संसार बसा दिया।

तुम्हारी गोद वह पहला मंदिर है जहाँ सिर झुकाते ही सारे दुख उतर जाते हैं। तुम्हारी उँगली पकड़कर चलना सीखा तो लगा कि पूरी कायनात मुट्ठी में आ गई। तुमने बोलना सिखाया तो हर शब्द में रस घुल गया। तुमने हँसना सिखाया तो अंधेरों ने भी उजाला ओढ़ लिया। तुम्हारी लोरी में इतनी ताकत है कि जन्म-जन्म के थके हुए प्राण भी विश्राम पा जाते हैं।

माँ, तुम अलौकिक हो। तुम्हारे बिना तुलसी का पौधा भी सूना लगे, तुम्हारे बिना दीपक की लौ भी काँपने लगे। तुम हो तो आँगन में तुलसी महकती है, दहलीज पर शुभ के चिन्ह बनते हैं, रसोई से उठती सोंधी खुशबू में पूरा घर तृप्त हो जाता है। तुम थकती नहीं, क्योंकि तुम्हारी नसों में प्रेम की गंगा बहती है जो कभी सूखती ही नहीं।

तुम्हारी आँखें पढ़ लेती हैं वह दर्द भी जो होंठ कह नहीं पाते। रात को जब बुखार में तपते माथे पर तुम्हारा ठंडा हाथ रखा जाता है, तो लगता है जैसे स्वयं माँ भगवती ने आशीष दे दिया। तुम जागती हो तो सारा घर सोता है, तुम सो जाओ तो लगता है दीवारें भी सहम गई हैं।

तुम्हारा आँचल सिर्फ कपड़ा नहीं है माँ, वह तो अनंत आकाश है। उसमें बचपन छुप जाता है, जवानी सँवर जाती है, बुढ़ापा भी सुकून पा लेता है। उस आँचल में नमक-मिर्च की पुड़िया भी बँधती है और आशीर्वाद भी। उसमें आँसू पोंछने की ताकत है और दुनिया से लड़ने का हौसला भी।

तुम्हारी रसोई में जादू है। बासी रोटी पर घी-शक्कर रख दो तो अमृत लगती है। तुम्हारे हाथ का नमक भी प्रसाद बन जाता है। तुम जब कहती हो “बेटा, खा ले”, तो पेट से पहले आत्मा तृप्त हो जाती है। तुम खुद भूखी रहकर भी थाली परोसती हो और पूछती हो “और लेंगे?” माँ, ये ममता कहाँ से लाती हो? कौन-सा सागर है तुम्हारे भीतर जो कभी खाली नहीं होता?

तुम्हारी डाँट में भी दुआ छुपी होती है। जब तुम आँख दिखाती हो तो लगता है जैसे सरस्वती ने वीणा रोककर समझाया हो। तुम्हारे थप्पड़ में भी इतना प्यार होता है कि गाल सहलाते हुए मन कहता है “माँ ने मारा है, बिगाड़ने के लिए नहीं, सँवारने के लिए”।

माँ, तुम समय से परे हो। तुम्हारे लिए न दिन है न रात, न होली है न दिवाली। तुम्हारे लिए तो हर दिन संतान की सलामती का व्रत है। तुम दहलीज पर दिया रखकर बाट जोहती हो, और जब तक बेटा लौट न आए, तुम्हारी पलकें झपकती नहीं। तुम्हारी प्रतीक्षा में युग बीत जाएँ तो भी उफ नहीं करती।

तुम वह पाठशाला हो जहाँ बिना फीस के संस्कार मिलते हैं। तुमने सिखाया कि झूठ से रोटी बड़ी नहीं होती, कि मेहनत से तकदीर लिखी जाती है, कि बड़ों के पैर छूने से उम्र नहीं घटती। तुमने सिखाया कि बेटी पराया धन नहीं, कुल की मर्यादा है। तुमने सिखाया कि हारकर भी जीतना क्या होता है।

तुम्हारे घुटने भले ही दुखते हों, पर पोते-पोती को कंधे पर बिठाकर घोड़ा बनने में तुम्हें दर्द नहीं होता। तुम्हारी साड़ी भले पुरानी हो जाए, पर बच्चों की स्कूल ड्रेस नई चाहिए। तुम खुद चप्पल घिस-घिसकर पहन लोगी, पर बेटी की सैंडल पर एक खरोंच भी बर्दाश्त नहीं करोगी। माँ, ये त्याग तुमने किस किताब से पढ़ा?

तुम्हारी चुप्पी भी बोलती है। जब हम परदेश चले जाते हैं तो तुम फोन पर कहती हो “मैं ठीक हूँ”, पर तुम्हारी साँसों की थकान हम हजार कोस दूर से सुन लेते हैं। तुम तस्वीर से बात करती हो, खाने की थाली पर हमारा हिस्सा ढककर रखती हो, कि “कहीं बेटा अचानक आ जाए”। माँ, तुम्हारे इंतजार का कोई मोल नहीं।

तुम आदि शक्ति हो, तुम अन्नपूर्णा हो, तुम गायत्री हो। वेद तुम्हारी महिमा गाते हैं, पुराण तुम्हारी गाथा लिखते हैं, फिर भी तुम तारीफ से परे हो। तुम्हें मंदिर नहीं चाहिए, तुम खुद मंदिर हो। तुम्हें फूल नहीं चाहिए, तुम खुद बगिया हो। तुम्हें आरती नहीं चाहिए, तुम्हारे चरणों की धूल ही हमारे लिए प्रसाद है।

माँ, अगर ईश्वर धरती पर आता है तो तुम्हारा रूप लेकर आता है। अगर प्रेम को देह मिलती तो वह तुम्हारी बनती। अगर त्याग को चेहरा मिलता तो वह तुम्हारा होता। अगर ममता को आवाज मिलती तो वह तुम्हारी लोरी बनती।

तुमसे बड़ा कोई तीर्थ नहीं, तुमसे पवित्र कोई नदी नहीं। काशी जाकर भी जो न मिले, वह तुम्हारे चरणों में मिल जाता है। चारों धाम घूम आएँ, पर तुम्हारे बिना आत्मा प्यासी ही रहती है।

आज मैं तुम्हारे सामने हाथ जोड़कर खड़ा हूँ माँ। मेरे शब्द छोटे हैं, मेरी कलम टूटी है, मेरी स्याही सूखी है। फिर भी लिख रहा हूँ क्योंकि तुमने ही कहा था “बेटा, मन की बात कह दिया कर, बोझ हल्का हो जाता है”।

माँ, मुझे कुछ नहीं चाहिए। न धन, न पद, न प्रतिष्ठा। बस इतना आशीष दे दो कि जब आखिरी साँस लूँ तो सिर तुम्हारी गोद में हो। मेरी अर्थी उठे तो तुम्हारी लोरी कानों में गूँजती रहे। मेरी राख उड़े तो तुम्हारे आँचल की छाँव साथ चले।

तुम अनंत हो, अखंड हो, अजेय हो। तुमसे ही शुरू होकर तुम पर ही खत्म होती है मेरी दुनिया। तुमसे पहले मैं कुछ नहीं था, तुम्हारे बाद भी कुछ नहीं रहूँगा।

हे परम पूज्या, आदरणीया, ममतामयी माँ, तुम्हारे चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। जन्म-जन्मांतर तक तुम्हारी कोख मिले, यही वरदान चाहिए। तुम्हारी उँगली पकड़कर फिर से चलना है, तुम्हारी लोरी सुनकर फिर से सोना है, तुम्हारे हाथ से पहला निवाला फिर से खाना है।

माँ, तुम हो तो सब है। तुम नहीं तो कुछ नहीं। तुम अकल्पनीय हो, अद्भुत हो, अलौकिक हो। तुम आनंद हो, तुम अनंत हो, तुम श्रद्धा हो, तुम भावना हो। तुम ही मेरी सुबह हो, तुम ही मेरी शाम। तुम ही मेरी प्रार्थना, तुम ही मेरा परिणाम।

तुम्हें नमन माँ, तुम्हें नमन।

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