
दर्पण में जब पड़ी अचानक, इक गहरी-सी दरार,
टूट गए कुछ स्वप्न पुराने, बिखर गया संसार।
चेहरे तो सब वैसा ही थे, बदले मगर विचार,
मन के भीतर छुपे हुए थे, कितने ही अंधकार।
जिसको अपना मान रहे थे, निकला वही पराया,
मीठे बोलों के पीछे था, छल का काला साया।
विश्वासों की डोर अचानक, कैसे हुई लाचार,
दर्पण में जब पड़ी अचानक, इक गहरी-सी दरार।
टुकड़ों-टुकड़ों में दिखता है, जीवन का आकार,
हँसी अधूरी, आँसू आधे, बिखरे सब व्यवहार।
कल तक जिन रिश्तों में दिखता, प्रेमिल उजियारा,
आज वहीं पर जलता दिखता, स्वार्थों का अंगारा।
फिर भी मैंने हार न मानी, जोड़ा हर एहसास,
टूटे दर्पण ने सिखला दी, जीने की परिभाष।
दरारें ही बतलाती हैं, कितना गहरा प्यार,
चोटें ही मजबूत बनातीं, जीवन का आधार।
अब न डरूँगा टूटन से मैं, सीखा यह उपहार,
दर्पण चाहे टूट भी जाए, बचता सच्चा सार।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार











