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कभी आना तुम

समां बदल गया फिज़ाये भी बदल गयी
नज़रें ना बदली वो शाम ना बदली
इन्तीज़ार भी मायूश है
हमारे खातिर ना सही उदास वो शाम को निहारने कभी आना तुम
वो बादलों के साये पर ढलता सुहाना मौसम
वो ठंडी हवाओं के झोंको मे दीदार करते मेरे तुम्हारे दो नयन
दिल की धड़कनों का वो मधुर संगीत फिर सुनने हो सके तो कभी आना तुम
वो मोहब्बत भी क्या थी नयनों से ही बयाँ होती थी
ज़ुबाँ की खामोशी ही इज़हार-ए-मोहब्बत होती थी
शर्मों हया का वो पर्दा दोनो तरफ से तामील होता था
उस पर्दे की रंगत देखने हो सके तो अभी आना तुम
बहुत याद आती है वो घर की छत
वो डूबते सूर्य की गुलाबी चटक शाम की
वो टहलते कदमों से निहारते एक दूजे के तडपते अरमाँ की
याद आते है जब वो पल दिल आँसूओं के सैलाब मे डूब जाता है
इस डूबे हुए दिल को उबारने हो सके तो कभी आना तुम।


संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र

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