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नव सृजन


उठ नव सृजन कर, यह वक़्त है प्रबल।
कार्य नव सृजन का, नव जोश से तू कर।
उठ सूर्य से पहले, सूर्य को तू जगा।
देख चारों ओर तेरे, चमक रही है प्रभा।

स्वयं को पहचान, तू तेज है प्रचंड है।
शक्ति तेरे बाज़ुओं की, तेरा भुज दंड है।
तुझ में जो धधक रही, अग्नि की प्रचंड ज्वाला।
डर, आलस और प्रमाद, कर हिम्मत इसे जला।

निकल सृजन की राह पर, ब्रम्हांड तेरे साथ है।
शक्ति का तू पुँज है, आदि शक्ति तेरे साथ है।
तू कर विनाश पाप का, धरती को पाप मुक्त कर।
शिव का तू रूप धर, संहार पापियों का कर।

काम क्रोध लोभ मोह, ये सभी शैतान हैं।
दूर इन्हें खुद से रख, तू ब्रम्हा की संतान है।
आस पास देख जरा, नजरों को अपनी घुमा।
झूठ धोख़ा व्यभिचार, फैला जैसे हो धुआँ।

इस धुयें को दूर करने, तू शंखनाद कर।
धरती को पाप मुक्त करने, तू भी प्रयास कर।
सतयुग वापसी का कार्य, तीव्रता से चल रहा।
सूक्ष्म जगत में जैसे, सतयुग हो बन गया।

समय को जरा समझ, व्यसनों को खुद से दूर कर।
समय है परिवर्तन का, तू इसमें सहयोग कर।
दाएँ बाये बहुत देखा, नजरों को जरा ऊपर कर।
कौरवों और पांडवों का, किरदार तू जरा समझ।

स्वयं को अर्जुन समझ, रख दृष्टि अपने लक्ष्य पर।
श्री कृष्ण जिसके सारथी, किस बात का उसे है डर।
उठ नव सृजन कर ,यह वक़्त है प्रबल।
कार्य नवसृजन का , नव जोश से तू कर।

रचनाकार- श्रीमती सुनीता बोपचे सिवनी ( म प्र)

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