
विधा: कुंडलियाँ छंद
धरती बोझिल पाप से,
बढ़ता अत्याचार।
संकट आता जगत पर,
लेते प्रभु अवतार।।
लेते प्रभु अवतार,
विविध रूपों को धर के।
करते दुष्ट संहार,
पापियों का नाश कर के।
विनती करें प्रशांत,
कृपा तुम्हरी दुःख हरती।
हे करुणा के सिंधु,
तृप्त होती है धरती।।
भगवान दास शर्मा “प्रशांत”
इटावा उत्तर प्रदेश












