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आह जिंदगी!

ये जिंदगी तू कितनी लाजवाब है,
इस जिंदगी का कोई तो रखता हिसाब है।।

सोचो! जिंदगी को खूबसूरत कैसे बनाए..?
सिर्फ अपने लिए न जिए,और के चेहरे पर मुस्कान लाए।।

प्रकृति भी सिखाती सहनशील बने,
औ करुणा प्रेम नम्रता में झुक जाय।
मत बांध लो आंखों पर पट्टी दर्प की,
कितनी हसी महबूबा सी,ये जिंदगी न देख पाए।।

कभी खट्टी मीठी तो कभी कड़वी लगे जिन्दगी,
हमेशा शहद सी मीठी जिंदगी न हो पाए।
दुख से ही सुख की अनुभूति है ये दोस्त,
सुख- दुःख संयोग से ये अनुभव सिखाए।।

खुशी कहीं दूर नहीं बसती है मेरे दिल में,
बस मृगतृष्णा सम उसे महसूस न कर पाए।
भटकते है ढूंढते हैं पीछा करते है खुशी का,
लेकिन वो तो प्रेम और सरलता से से ही मिल पाएं।।

हर एक अच्छे काम के बाद,
कानों में खुशी बुदबुदाती है।।
मैं तो तेरे साथ हूँ, क्या तू मुझे महसूस कर पाए।

छोटी-छोटी खुशियों के पल आते जीवन में,
सतरंगी तितली सी ठहरे नहीं उड़ती जाय।
जिंदगी सरिता सी कल कल बह रही है,
प्रभु शरण रह, खुशी संग क्यों न जीवन जिया जाय।।

भगवानदास शर्मा “प्रशांत”
शिक्षक सह साहित्यकार
इटावा उत्तर प्रदेश

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