
बिनु पद चलई सुनई बिनु काना।
कर बिनु करम ,कर ई विधि नाना।।
आनन रहित सकल रस भोगी,।
बिनु बानी बकता बड़ जोगी।।
तन बिनु परस नयन बिनु देखा,।
ग्रह ई घृआन बिनु बास असेषा ।।
अस सब भांति अलौकिक करनी।
महिमा जासु जाई नहीं बरनी।।
रामचरितमानस बालकांड दोहा, क्रमांक 118,
हानि, लाभ ,जीवन ,मरण।
यस ,अपजस, विधि हाथ।।
वह ब्रह्म बिना ही पैर के चलता है, बिना ही कान के सुनता है, बिना ही हाथ के नाना प्रकार के काम करता है, बिना मुंह,
जीभ के ही छहों रसों का आनंद लेता है और बिना ही वाणी के बहुत कुछ योग्य वक्ता है।
वह बिना ही शरीर के सब स्पर्श करता है, बिना ही आंखों के देखता है और बिना ही नाक के सभी गंध को ग्रहण करता है।
उसे ब्रह्म की करनी सभी प्रकार से ऐसी अलौकिक है की जिसकी महिमा कहीं नहीं जा सकती है।
जीवन में किसको लाभ देना है, किसको हानी
पहुंचानी है, किसको जीवन देना है , किसको मृत्यु।
किसको यश देना है और किसको अपयश देना है,,
ये सभी कार्य विधि के अनुसार ही होते हैं, अर्थात ईश्वर की इच्छा से ही संसार में किए जाते हैं।
इन सभी में संसार के मनुष्य की बुद्धि से परे है।
राजेंद्र कुमार, तिवारी मंदसौर, मध्य प्रदेश











