
आंखों का समंदर कैसा अजीब समंदर है
यह ऐसा समंदर जिस नाप न सके कोई, ना इनका ओर न छोर
हर बूंद में है छुपा कोई शोर
बिना तूफान और लहरों के बिना
भी तूफान मचाता है
आंखों में समंदर का सैलाब जब उठे तो दिल को भी हिला देता है
अगर आंसू बरसे तो भीतर तक बहा ले जाता है
यह आंखों का समंदर ऐसा ही है
जिसमें डूबता ही चला जाता है
ना किनारा मिलता ना खुद से ही मिलता
सच, ये अश्कों की बात है
हर बूंद एक अधूरी दास्तां को बयां करती है
बिना कहे सारा राज, अश्कों से
बह कर निकल आता है
आंखों में यादों का भंवर, भीतर ही रह जाता है
तो कभी उम्मीद की कश्ती दूर तक बहती जाती है
आंखों में समंदर गहरा, शांत पाते हैं
तो कभी तूफानों से जूझता हुआ पाते हैं
ये आंखें हैं रूह का समंदर कोई
जिसमें हर जज़्बा चुपचाप उतर जाता है कोई
ये आंखें ही है जो सब कुछ बयां कर जाती है
डॉ मीना कुमारी परिहार











