
मां जी गई वह दुनिया,
जिसे जीते हैं सभी संत।
मौत भी न पा पाईं,
प्रेम का अंत,अनन्त।
वह छण कैसा दुर्लभ होगा,
प्रथक प्रथक भगवंत।
हर स्वास स्वास में समा गया,
जल मग्न हुआ, क्यूं कंत।
आशा और निराश, जीवन मोह लागा।
आंखों ने देखे क्या सपने।
मन पागल फिर बेचैन हुआ,
मां की ममता जीती तन यह हार गया।
ईश्वर तेरी इस नगरी के,
चित्र बड़े विचित्र।
उद्वेलित करते हृदय को,
यह सारे प्रबंध।
मां जी गई वह दुनिया,
जिसे जीते हैं सभी संत।
कमल











