
एक सत्य जीवन दर्शन
डाक्टर दीपक गोस्वामी
मानवीय ब्यवहार वैज्ञानिक
आप देश के चर्चित लेखक,मोटिवेशनल स्पीकर, ट्रेनर,सामजिक कार्यकर्ता है
सत्यवान सावित्री की कथा भारतीय संस्कृति की वह अमर गाथा है जो प्रेम, संकल्प और नारी शक्ति के अद्भुत मेल को दर्शाती है। वट सावित्री व्रत इसी कथा से जुड़ा है और हर साल ज्येष्ठ अमावस्या को सुहागिन स्त्रियाँ अपने पति की लंबी आयु के लिए यह व्रत रखती हैं। इस कथा का मूल मद्र देश के राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री से जुड़ा है। राजा अश्वपति को संतान नहीं थी। उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए कठोर तप किया। देवी सावित्री की कृपा से उन्हें कन्या प्राप्त हुई जिसका नाम भी सावित्री रखा गया।
सावित्री रूप, गुण और बुद्धि में अद्वितीय थी। जब वह विवाह योग्य हुई तो स्वयंवर के लिए स्वयं वर चुनने निकली। वन में उसने साल्व देश के निर्वासित राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को देखा। सत्यवान माता पिता की सेवा में लगा था। वह तेजस्वी, सत्यवादी और धर्मात्मा था। सावित्री ने मन ही मन उसे पति रूप में वरण कर लिया। पर जब नारद मुनि को यह पता चला तो उन्होंने राजा अश्वपति को बताया कि सत्यवान अल्पायु है। विवाह के एक वर्ष बाद ही उसकी मृत्यु निश्चित है। पिता ने सावित्री को समझाया कि वह दूसरा वर चुने। पर सावित्री का उत्तर कालजयी है। उसने कहा कि कन्यादान एक बार होता है। मन से जिसे वर लिया, वही मेरा पति है। आयु लंबी हो या छोटी, मैं सत्यवान से ही विवाह करूँगी। यह उत्तर सावित्री के संकल्प को दिखाता है। यहाँ नारी की स्वतंत्र सोच और निर्णय शक्ति प्रकट होती है। समाज में अक्सर स्त्री का चुनाव दूसरों पर छोड़ दिया जाता है, पर सावित्री अपना भाग्य खुद लिखती है।
विवाह के बाद सावित्री राजमहल का सुख छोड़कर वन में कुटिया में रहने लगी। सास ससुर की सेवा और पति का साथ ही उसका धर्म बन गया। वह दिन गिन रही थी। नारद ने जो तिथि बताई थी वह निकट आ रही थी। सावित्री ने तीन दिन पहले से कठिन व्रत शुरू किया। वह अन्न जल त्याग कर दिन रात सत्यवान के साथ रहने लगी। जिस दिन सत्यवान लकड़ी काटने वन गया, सावित्री भी साथ गई। दोपहर में सत्यवान के सिर में पीड़ा हुई। वह सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गया। तभी यमराज प्रकट हुए। वे सत्यवान के सूक्ष्म शरीर को लेकर दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े।
यहाँ से कथा लौकिक से परालौकिक हो जाती है। सावित्री भी यमराज के पीछे चल दी। यमराज ने रोका कि जीवित मनुष्य यमलोक नहीं जा सकता। सावित्री ने तर्क दिया कि जहाँ पति जाएँ, पत्नी का धर्म है वहाँ जाना। उसके ज्ञान भरे वचन सुनकर यमराज प्रभावित हुए। उन्होंने कहा कि सत्यवान के प्राण के सिवा कोई भी वर माँग लो। सावित्री ने पहले ससुर द्युमत्सेन की आँखों की ज्योति और खोया राज्य माँगा। यमराज ने दिया। फिर उसने ससुर के लिए सौ पुत्र माँगे। यमराज ने तथास्तु कहा। आगे बढ़ने पर सावित्री ने अपने पिता के लिए सौ पुत्र माँगे। यमराज ने दे दिया। अंत में सावित्री ने वर माँगा कि मैं सत्यवान से सौ पुत्रों की माता बनूँ। यमराज वचन दे चुके थे। अब वे धर्म संकट में पड़ गए। बिना सत्यवान को जीवित किए यह वर पूरा नहीं हो सकता था। यमराज ने सावित्री की बुद्धि, धैर्य और पति प्रेम से हारकर सत्यवान का जीवन लौटा दिया।
वट वृक्ष के नीचे यह घटना हुई इसलिए वट सावित्री व्रत में वट की पूजा मुख्य है। वट वृक्ष दीर्घायु है। उसकी जड़ें गहरी और शाखाएँ फैली होती हैं। वह परिवार के विस्तार और स्थिरता का प्रतीक है। स्त्रियाँ वट को सूत लपेटकर परिक्रमा करती हैं। यह सूत रिश्तों को बाँधने का प्रतीक है। सावित्री ने मृत्यु के सूत को भी अपने प्रेम और तर्क से बाँध लिया था।
इस कथा का सामाजिक पक्ष बहुत मजबूत है। यह सिखाती है कि स्त्री अबला नहीं है। वह समय आने पर यम से भी लड़ सकती है। सावित्री ने शस्त्र नहीं उठाया, शास्त्र और तर्क से विजय पाई। यह संदेश है कि शिक्षा और विवेक सबसे बड़ा बल है। आज के समय में जब रिश्ते कमजोर पड़ रहे हैं, सावित्री का समर्पण दंपत्ति को जोड़ने का काम करता है। व्रत के बहाने परिवार एक जगह बैठता है। नई पीढ़ी को संस्कार मिलते हैं।
आध्यात्मिक स्तर पर यह कथा बताती है कि प्रेम में इतनी शक्ति है कि वह विधि का लिखा भी बदल दे। सत्यवान नाम ही सत्य का प्रतीक है। सावित्री ने सत्य का साथ दिया तो मृत्यु को भी लौटना पड़ा। यमराज यहाँ क्रूर नहीं, नियम के पालक हैं। पर नियम से भी ऊपर धर्म है, और धर्म से ऊपर प्रेम। सावित्री ने पति धर्म, पुत्री धर्म और मानवीय धर्म तीनों निभाए। उसने स्वार्थ में केवल पति का जीवन नहीं माँगा। पहले सास ससुर और पिता का हित सोचा। यही भारतीय नारी का लोकमंगल वाला रूप है।
लौकिक दृष्टि से देखें तो यह कथा हमें योजना, तैयारी और समय प्रबंधन सिखाती है। सावित्री को पता था कि संकट कब आएगा। उसने तीन दिन पहले से तप शुरू किया। शरीर और मन को तैयार किया। हम भी जीवन में आने वाले संकट को पहले से भाँपकर तैयारी करें तो परिणाम बदल सकते हैं। परालौकिक पक्ष यह है कि आत्मा अजर अमर है। शरीर छूटता है पर संकल्प और प्रेम की ऊर्जा आत्मा को वापस खींच सकती है।
प्रेरणादायक बात यह है कि सावित्री राजकुमारी थी पर उसने वन का कष्ट चुना। सुख में साथ निभाना सरल है, दुख में साथ निभाना तपस्या है। आज की पीढ़ी के लिए यह सबसे बड़ी मोटिवेशन है। रिश्ते सुविधा से नहीं, जिम्मेदारी से चलते हैं। व्रत का मतलब केवल भूखा रहना नहीं है। व्रत का अर्थ है धारण करना। सावित्री ने सत्य, प्रेम और कर्तव्य को धारण किया। इसलिए वह जीत गई।
तथ्य परक समालोचना करें तो कुछ लोग कहते हैं कि यह कथा स्त्री से एकतरफा त्याग माँगती है। पर ध्यान दें कि सत्यवान भी धर्मात्मा और सेवाभावी था। यह कथा योग्य साथी चुनने का महत्व भी बताती है। सावित्री ने गुण देखकर वर चुना, धन या राज्य देखकर नहीं। दूसरा पक्ष यह है कि क्या मृत्यु टाली जा सकती है। कथा का मर्म चमत्कार नहीं है। मर्म है कि अंतिम क्षण तक हार न मानो। बुद्धि और वाणी से असंभव को भी संभव करने का प्रयास करो। विज्ञान भी मानता है कि इच्छाशक्ति से रोगी की आयु बढ़ती है।
जमीनी स्तर पर वट सावित्री का व्रत गाँव गाँव में स्त्रियों को जोड़ता है। वे साथ बैठकर कथा सुनती हैं। सामूहिकता बढ़ती है। पर्यावरण के लिए भी यह व्रत अच्छा है क्योंकि वट की पूजा से पेड़ों का संरक्षण होता है। वट चौबीस घंटे ऑक्सीजन देता है। उसकी पूजा का वैज्ञानिक आधार भी है।
सार यह है कि सत्यवान सावित्री की कथा केवल पति की उम्र बढ़ाने की कहानी नहीं है। यह जीवन जीने की कला है। यह सिखाती है कि प्रेम में समर्पण हो, निर्णय में दृढ़ता हो, वाणी में मधुरता और तर्क हो, और मन में लोककल्याण की भावना हो तो कोई भी यमराज तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। यह कथा हर युग में प्रासंगिक है क्योंकि संकट का रूप बदलता है, पर समाधान का सूत्र वही रहता है। संकल्प, विवेक और करुणा। जो इन्हें धारण कर ले, वह साधारण मनुष्य होते हुए भी सावित्री बन जाता है। इसलिए वट सावित्री व्रत केवल परंपरा नहीं, जीवन निर्माण की पाठशाला है।










