
जब मन उदास होता है
तब शब्द भी चुप हो जाते हैं,
भीड़ भरी इस दुनिया में
हम खुद से ही दूर हो जाते हैं।
आँखों में हल्की नमी लिए
चेहरे पर मुस्कान सजाते हैं,
दिल के टूटे हुए टुकड़ों को
हर दिन फिर से छुपाते हैं।
कभी खामोश रातों में
चाँद भी फीका लगता है,
और अपने ही सपनों का
रास्ता धुँधला लगता है।
मन पूछता है धीरे से —
“क्या सब सच में बदल जाएगा?”
फिर भीतर से एक स्वर आता —
“हाँ, ये समय भी गुजर जाएगा।”
उदासी कोई अंत नहीं,
बस मौसम की एक शाम है,
हर अंधेरे के बाद ही
उगता नया प्रभात है।
इसलिए टूटना मत कभी,
अपने हौसले को थामे रखना,
मन चाहे जितना उदास हो
उम्मीद का दीप जलाए रखना।
कृष्ण कान्त कपासिया










