श्रीमद्भगवद्गीता । व्यक्तिगतमन की समस्या से लेकर विश्व मंच तक हर एक समस्या के 100 तालों की एक लौकिक चाभी।

डाक्टर दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
समन्वयक।आदर्श संस्कार शाला,भारत
आप देश के चर्चित लेखक,मोटिवेशनल स्पीकर,ट्रेनर, सामाजिक कार्यकर्ता है।
केवल एक ग्रंथ नहीं है, वह जीवन को जीने की कला है जो हर युग में उतनी ही प्रासंगिक रहती है जितनी कुरुक्षेत्र के मैदान में थी। इसके अठारह अध्याय मनुष्य की चेतना की अठारह सीढ़ियां हैं। पहला अध्याय मोह को दुख का कारण बताता है। अर्जुन का विषाद हम सबका विषाद है। जब अपने ही लोग सामने खड़े हों तो हाथ कांपते हैं और गांडीव गिर जाता है। यह मोह रिश्तों का हो, पद का हो या धन का हो, यह आंखों पर ऐसा पर्दा डालता है कि धर्म अधर्म जैसा लगने लगता है और अधर्म धर्म जैसा। आज के समय में भी परिवार में बंटवारे, नौकरी का डर, बच्चों के भविष्य की चिंता, ये सब मोह के ही रूप हैं। गीता कहती है कि इस मोह से बाहर निकलो क्योंकि मोह में लिया गया निर्णय हमेशा दुख देता है। राजनीति में भी यही होता है जब नेता वोट बैंक के मोह में पड़कर देशहित भूल जाते हैं तो समाज टूटता है। कूटनीति में भी जब कोई देश केवल अपने लाभ के मोह में पड़ता है तो युद्ध होते हैं।
दूसरा अध्याय इस मोह की दवा देता है। आत्मा अमर है, मृत्यु का डर छोड़ो। शरीर कपड़े की तरह है जो पुराना होने पर बदल जाता है। यह ज्ञान होते ही मनुष्य निडर हो जाता है। सैनिक सीमा पर इसलिए लड़ पाता है क्योंकि वह जानता है कि मरता शरीर है, वह नहीं। एक किसान इसलिए हर साल बीज बोता है क्योंकि उसे भरोसा है कि प्रकृति का चक्र रुकेगा नहीं। सामाजिक स्तर पर जब हम मृत्यु के डर से ऊपर उठते हैं तभी सती प्रथा, बाल विवाह जैसी कुरीतियों से लड़ पाते हैं। पारलौकिक दृष्टि से यह समझ जीवन और मृत्यु के भय से मुक्त कर देती है और लौकिक जीवन में यह साहस देती है कि सही काम के लिए खड़े हो जाओ।
तीसरा अध्याय कर्म का विज्ञान समझाता है। कर्म करो, फल की चिंता मत करो। यह पलायन नहीं है बल्कि बहुत बड़ी कूटनीति है। जब आप फल पर ध्यान देते हैं तो मन बंट जाता है और कर्म कमजोर हो जाता है। एक खिलाड़ी अगर मैच के दौरान स्कोरबोर्ड देखता रहे तो कैच छोड़ देगा। एक विद्यार्थी अगर परीक्षा में नंबर की चिंता करेगा तो प्रश्न भूल जाएगा। समाज में अगर हर व्यक्ति अपना काम ईमानदारी से करे और परिणाम की होड़ छोड़ दे तो भ्रष्टाचार अपने आप खत्म हो जाएगा। कृष्ण ने अर्जुन से यही कहा कि तू योद्धा है तो युद्ध कर, क्षत्रिय धर्म निभा, जीत हार मेरे ऊपर छोड़ दे। यह संदेश आज के कॉरपोरेट जगत में भी उतना ही सच है जितना कुरुक्षेत्र में था।
चौथा अध्याय ज्ञान की मशाल जलाता है। ज्ञान से ही अज्ञान का अंधेरा मिटता है। अज्ञान केवल किताबी नहीं होता। सबसे बड़ा अज्ञान है अपने आप को शरीर मान लेना। जब तक यह भ्रम है तब तक राग द्वेष, लाभ हानि, मान अपमान में उलझे रहेंगे। ज्ञान होते ही पता चलता है कि मैं तो साक्षी हूं, करने वाला तो प्रकृति का गुण है। यह ज्ञान धार्मिक कर्मकांड से नहीं आता, यह तर्क और अनुभव से आता है। इसीलिए कृष्ण ने अर्जुन को पहले समझाया, फिर विश्वास करने को कहा। सामाजिक रूप से जब समाज शिक्षित होता है तो अंधविश्वास, जातिवाद, लिंगभेद का अंधेरा छंटता है। राजनीतिक दल भी जनता को अज्ञानी रखकर ही राज करते हैं। इसलिए ज्ञान ही असली क्रांति है।
पांचवां अध्याय कहता है शांति अपने भीतर ही खोजें। हम बाहर महल, गाड़ी, पद में शांति ढूंढते हैं पर वह तो टिकती ही नहीं। भीतर की शांति ही स्थायी है। यह बात लौकिक और पारलौकिक दोनों जगह सच है। एक संन्यासी हिमालय में भी अशांत हो सकता है और एक गृहस्थ बाजार के बीच में भी शांत रह सकता है। कूटनीति में भी जो देश भीतर से स्थिर होता है वही बाहर की चुनौतियों से निपट पाता है। परिवार में भी जब हर सदस्य भीतर से शांत हो तो घर स्वर्ग बन जाता है।
छठा अध्याय मन पर जीत की बात करता है। मन को जीतना ही सबसे बड़ी जीत है। यह मन ही हमें कभी स्वर्ग का लालच देता है कभी नर्क का डर। इसे वश में करना तलवार से युद्ध जीतने से भी कठिन है। योग, प्राणायाम, ध्यान सब इसी के उपकरण हैं। जो व्यक्ति अपने मन का मालिक हो गया वह परिस्थिति का गुलाम नहीं रहता। सामाजिक रूप से अगर युवाओं का मन काबू में हो तो नशा, अपराध, अवसाद खुद खत्म हो जाएंगे। राजनीतिक नेतृत्व के लिए तो मन का संतुलन सबसे जरूरी गुण है वरना अहंकार में बड़े साम्राज्य डूब जाते हैं।
सातवें से बारहवें अध्याय तक भक्ति और श्रद्धा का मार्ग खुलता है। श्रद्धा ही ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग है। बिना श्रद्धा के ज्ञान भी सूखा तर्क बन जाता है। अंत समय में जैसा भाव, वैसी ही गति, यह मनोविज्ञान का बहुत गहरा सूत्र है। जीवन भर जिस चीज का अभ्यास किया होगा, मरते समय वही याद आएगी। इसलिए हर दिन को अंतिम दिन समझकर जियो। परमात्मा हर कण में वास करते हैं, यह पर्यावरण का सबसे बड़ा संदेश है। जब हर पेड़, नदी, पहाड़ में ईश्वर दिखेगा तो कोई उसे काटेगा नहीं, गंदा नहीं करेगा। ईश्वर ही सृष्टि का आदि और अंत है, यह बात विज्ञान भी अब मानने लगा है कि ऊर्जा नष्ट नहीं होती केवल रूप बदलती है। काल के सामने सब विवश हैं, बस निमित्त बनो, यह अहंकार की सबसे बड़ी काट है। हम करते नहीं हैं, हमसे कराया जाता है। यह समझते ही कर्तापन का बोझ हट जाता है। भक्ति ही परम सत्य का मार्ग है क्योंकि प्रेम में तर्क खत्म हो जाता है और समर्पण शुरू होता है।
तेरहवें से अठारहवें अध्याय तक गीता जीवन का पूरा नक्शा दे देती है। शरीर क्षेत्र है, आत्मा उसका ज्ञाता। यह देह भाव से ऊपर उठने की कुंजी है। गुणों से ऊपर उठकर ही मुक्ति संभव है। सतोगुण भी बांधता है अगर उसमें आसक्ति हो जाए। परमात्मा ही संसार रूपी वृक्ष की जड़ हैं। जड़ को पानी दो, पत्ते अपने आप हरे होंगे। अहंकार का त्याग करो, दैवीय गुण अपनाओ। अहंकार ही रावण को जलाता है और दैवीय गुण ही राम को पूजनीय बनाते हैं। जैसी तुम्हारी श्रद्धा होगी, वैसे तुम बनोगे। यह आज के मनोविज्ञान का आधार है कि विश्वास ही व्यक्तित्व बनाता है। और अंत में सब कुछ ईश्वर को सौंप दो, वही तुम्हें बचाएंगे। यह शरणागति कायरता नहीं है, यह सबसे बड़ा साहस है। जब अपना बल, अपनी बुद्धि जवाब दे दे तो उस पर छोड़ देना जो सबका मालिक है।
इस तरह गीता का हर अध्याय व्यक्ति से लेकर राष्ट्र तक, घर से लेकर विश्व मंच तक, हर जगह का समाधान देता है। यह केवल मोक्ष का ग्रंथ नहीं है, यह वोट कैसे दें, व्यापार कैसे करें, युद्ध कब करें, समझौता कब करें, परिवार कैसे चलाएं, मन को कैसे साधें, इन सबका व्यावहारिक शास्त्र है। इसलिए यह कल भी प्रासंगिक थी, आज भी है और कल भी रहेगी।










