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शनिश्चरी अमावस्या


अहंकार के विसर्जन का दिवस
डाक्टर दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
आप देश के चर्चित लेखक,मोटिवेशनल स्पीकर, ट्रेनर,सामजिक कार्यकर्ता है।

शनिश्चरी अमावस्या केवल एक तिथि नहीं, वह काल के प्रवाह में छिपी हुई चेतना का विलक्षण संधिस्थल है। जब अमावस्या का अंधकार शनिदेव के न्यायमय तेज से मिलता है तब प्रकृति के गर्भ में एक अद्भुत रासायनिक परिवर्तन घटता है। यह पर्व स्थूल से सूक्ष्म की ओर यात्रा का आमंत्रण है जहाँ प्रत्येक जीव अपनी भीतरी ग्रंथियों को खोलकर अपने कर्मों का साक्षात्कार करता है।

वैदिक दर्शन में शनि को आयुष्कारक और कर्मफलदाता कहा गया है। सूर्यपुत्र शनि मंदगति से चलते हैं इसलिए वे धैर्य, अनुशासन और गहन चिंतन के प्रतीक हैं। अमावस्या चंद्रमा की क्षीण अवस्था है जो मन के लय होने का संकेत देती है। जब शनिवार को अमावस्या पड़ती है तो मन की चंचलता शनि के स्थैर्य से बंध जाती है। इसी कारण ऋषियों ने इस दिन को आत्ममंथन और प्रायश्चित का सर्वोत्तम अवसर माना। यह संयोग वर्ष में एक या दो बार ही बनता है अतः इसकी ऊर्जा अत्यंत सघन हो जाती है।

अध्यात्म की दृष्टि से यह तिथि अहंकार के विसर्जन का पर्व है। अमावस्या का घना अंधेरा बाह्य दृष्टि को बंद करके अंतर्दृष्टि को खोलता है। शनि की दृष्टि जीव को उसके संचित कर्मों का दर्पण दिखाती है। इस दिन किया गया दान, जप और सेवा हजार गुना फलदायी कहा गया है क्योंकि यहाँ कर्ता भाव गलता है और केवल साक्षीभाव शेष रहता है। तेल, तिल, काला वस्त्र और लोहा दान करने की परंपरा प्रतीकात्मक है। तेल स्निग्धता का प्रतीक है जो शनि के रूखेपन को शांत करता है। तिल सूक्ष्मता का प्रतीक है जो बताता है कि छोटे कर्म भी बड़े फल देते हैं। लोहा कर्म की दृढ़ता का प्रतीक है जो संकल्प को अडिग बनाता है।

अलौकिक और परालौकिक संदर्भ में मान्यता है कि इस दिन पितृलोक और मृत्युलोक के बीच की दीवार पतली हो जाती है। पितरों के निमित्त तर्पण और पीपल वृक्ष की पूजा से पितृदोष शांत होता है। पीपल में ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों का वास माना गया है और शनिदेव को पीपल प्रिय है। दीपदान करके अंधकार में प्रकाश भरना वस्तुतः अपनी चेतना में ज्ञान का दीप जलाना है। सामाजिक स्तर पर यह पर्व जन जन को जोड़ता है। शनि को दरिद्र, श्रमिक, सेवक और उपेक्षित वर्ग का अधिपति माना गया है। इस दिन निर्धनों को भोजन, वस्त्र और औषधि देना केवल पुण्य नहीं बल्कि सामाजिक समरसता का व्यावहारिक प्रयोग है। जब समाज का संपन्न वर्ग अपने अहं को त्यागकर वंचित के साथ खड़ा होता है तब शनि प्रसन्न होते हैं क्योंकि शनि का न्याय समता पर आधारित है।

व्याख्या यह है कि शनिश्चरी अमावस्या ब्रह्मांडीय न्यायालय का वह दिन है जब जीव अपने ही कर्मों का लेखा स्वयं पढ़ता है। यहाँ कोई वकील नहीं, कोई गवाह नहीं। शनि दंड नहीं देते वे केवल परिणाम लौटाते हैं। अमावस्या का शून्य उस गर्भ का प्रतीक है जहाँ से नया चंद्रमा जन्म लेता है। इसीलिए यह पर्व अंत नहीं आरंभ है। जो व्यक्ति इस दिन अपने भीतर के अंधेरे को स्वीकार कर लेता है, अपने दोषों को तिलांजलि दे देता है, उसके जीवन में नई पौर्णिमा का उदय निश्चित है। यह पर्व डराने के लिए नहीं जगाने के लिए है। यह बताता है कि काल का प्रत्येक क्षण कर्म बीज बोने का अवसर है और शनिश्चरी अमावस्या वह विशेष ऋतु है जब बोया गया एक बीज सहस्र फल देता है। इसलिए इस दिन मौन, सेवा, स्वाध्याय और सरलता को धारण करना ही वास्तविक व्रत है।

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