
कितनी दूरी तलाश से गुजरी।
नींद आंखों के पास से गुजरी।।
बही जो सबको तर ब तर करने।
वो नदी मेरी प्यास से गुजरी।।
पहन रखे थे जो मोहब्बत ने।
उसकी खुशबू लिबास से गुजरी।।
है “विकल” दिल की व्याकरण ऐसी।
ये न संज्ञा समास से गुजरी।।
कवि विष्णु बाजपेई
"विकल"








