
मुझे इंतज़ार होता है बेसब्री से साल भर,
आया है फिर से पतिव्रत का यह पावन त्योहार।
जाने कितनी पतझड़ गुजरी, कितने तूफान आए,
फिर प्रकृति पूजन का यह अनुपम उत्सव आया है।
हाथों में कलावा और रेशमी धागा लेकर,
वट वृक्ष की परिक्रमा हम करती हैं मिलकर।
सती सावित्री की पावन कथा जुड़ी है जिससे,
सुनो सुहागिन बहनों! ये संदेश मिलता है इससे।
पेड़ों में भी जीवन है, ये संदेश हमें सिखाता,
यह पर्व पिया की दीर्घायु का प्रतीक बन जाता।
युग-युगों से होती आई है इस वट वृक्ष की पूजा,
इसके अखंड दर्शन सा पुण्य नहीं है कोई दूजा।
पाप नष्ट होते हैं, मिलती है स्थिरता और शक्ति,
वट वृक्ष के साये में बसी है अटूट श्रद्धा और भक्ति।
“नमो-नमो” का मंत्र जपते, हम धागा लपेटती हैं,
जल अर्पित कर देव से, अखंड सुहाग समेटती हैं।
सावित्री ने यमराज को भी अपने तप से झुकाया था,
नारी की शक्ति का लोहा पूरे जग को मनवाया था।
दुनिया की हर महिला तक यह संदेश पहुँचाना है,
नारी वास्तव में ‘नारायणी’ है, यह सबको बताना है।
जो ठान ले नारी, वो क्या हासिल नहीं कर सकती?
हर मुश्किल राह को वो आसान है कर सकती।
हर नारी के भीतर जगाना यह अटूट विश्वास है,
पिया का अटूट प्रेम ही तो सबसे खास है।
साड़ी, चूड़ी, बिंदी से हम रूप सँवारती हैं,
सोलह श्रृंगार कर पिया की बलाएँ उतारती हैं।
माँग में सिंदूर सजाकर, मन में ध्यान लगाती हैं,
लीची, केला, आम और चने का भोग लगाती हैं।
करके अपने पिया का भी आदर से पूजन,
बाँस के पंखे की हवा से पुलकित करती हैं तन-मन।
बरगद की छाँव में पूरी होती है हर आस,
धरती पर जैसे होने लगा हो बरखा का अहसास।
सुहागिन महिलाओं का यह सबसे प्यारा त्योहार है,
हाथों में पिया के नाम की रची महकती मेहँदी की धार है।
पैरों में पायल और बिछुआ की छम-छम बजती है,
कलाई में पिया के नाम की हरी चूड़ी सजती है।
कवयित्री ज्योति वर्णवाल
नवादा (बिहार )










