
राम-चंद्र हैं जीवन-नभ के,
आशा-दीपक ज्योति महान।
भक्ति-सरिता बहती उर में,
पाकर उनका शुभ वरदान॥
मन-मंदिर के देव वही हैं,
श्रद्धा का अनुपम श्रृंगार।
प्रेम-पुष्प बन खिलते क्षण-क्षण,
पाकर उनका स्नेह अपार॥
राम-नाम है सुधा-कलश यह,
पीकर मिटते सब संताप।
करुणा-सागर प्रभु की महिमा,
हर लेती जग के अभिशाप॥
चरण-कमल हैं मोक्ष-द्वार से,
खुलता जीवन का आलोक।
दया-धरा पर बरसे नित ही,
बनकर सुख का दिव्य अशोक॥
राम-सूर्य से जग उजियारा,
तम का होता शीघ्र विनाश।
सत्य-वटवृक्ष की शीतल छाया,
देती मन को नव विश्वास॥
सीता-संग शोभित प्रभु ऐसे,
जैसे चंदा संग चाँदनी।
मर्यादा के मेरु शिखर हैं,
जिनसे पावन हुई धरणी॥
हनुमत-हृदय के वे स्वामी,
विश्वासों के दृढ़ आधार।
धर्म-ध्वजा बन लहराते हैं,
जन-जन के जीवन-द्वार॥
राम प्राणनाथ हमारे हैं,
श्वासों का संगीत अमंद।
भव-सागर की नैया के वे,
बनते हैं सद्गुरु आनंद॥
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर ,बिहार












