
कब कैसे और कहाँ मिलोगे,
कन्हा येतो बता दो!
बहुत हुई ये लुका छुपी अब,
ऐसी न मुझे सजा दो!!
नहीं मिले तुम वृंदावन में,
न हीं मथुरा काशी में!!
कहाँ छुपे हो नटवर नागर,
बतलाओ न सांची में!!
बहुत छकाया है मनमोहन,
मैं छोडूंगा न तुझको!
चाहे जहां रहो तुम छलिया,
दर्शन दे दो मुझको!!
‘जिज्ञासु’ है निपट अनाड़ी,
अब ऐसे मत भरमाओ!!
लुका छुपी छोड़ के कन्हा,
उर में मेरे बस जाओ!!
झुके नजर दर्शन हों तेरे,
अनुपम भाग्य जगा दो!
चंचल मन चरणों में तेरे,
स्थिर हो यही सजादो!!
कमलेश विष्णु सिंह ‘जिज्ञासु’












