
जब ईश्वर ही प्रेमी हो गया”
बहुत सरल है व्यक्तित्व मेरा,
झूठ कहना मुझे नहीं आया।
सचमुच सच कहना आता है,
झूठ मुझे नहीं भाया।
एक झूठ छुपाने हेतु पास मेरे,
सौ झूठ का नहीं है खाता।
यदि किसी के भले के हेतु,
झूठ मुझे है बोलना पढ़ता।
उसको भला मैं झूठ क्यों समझू,
जो नजरों में मेरी है सच का भ्राता।
कान्हां ने जब माखन खाया,
फिर माता यशोदा को समझाया।
कहने लगे कान्हा मैया से,
सुन मैया मैं हूँ तेरा कन्हैया।
मैया मेरी मैं सच कहता हूँ,
हाँ, मैं ने ही माखन खाया।
मैया मेरी, मैं ने ही माखन खाया।
सुनकर भी जब माँ समझ न पायी,
ने ही माँ की समझ से नहीं हो गया।
एक छोटी सी समझ की फेर से,
सच मानो सच में झूठ हो गया।
बोली बहुत झूठ कहते हो कन्हैया,
आज बचा नहीं पायेंगे तुमको दाऊ भैया।
बहुत शरारती थे माना कन्हैया,
लोगों ने नाम दिया छलिया।
दुष्टों से सबकी रक्षा करते,
कैसे भला वो थे छलिया।
चंचलता से खेल समझकर,
जब दुष्टों का संहार किया।
अपनी लीलाओं को दिखाकर,
ब्रज गोकुल मथुरा को मोह लिया।
कैसे ना करते प्रेम सभी जन,
जब ईश्वर ही प्रेमी हो गया।
सचमुच सच कहना आता है,
झूठ मुझे नहीं भाया।
रचनाकार- श्रीमती सुनीता बोपचे सिवनी (म प्र)
जब ईश्वर ही प्रेमी हो गया”
बहुत सरल है व्यक्तित्व मेरा,
झूठ कहना मुझे नहीं आया।
सचमुच सच कहना आता है,
झूठ मुझे नहीं भाया।
एक झूठ छुपाने हेतु पास मेरे,
सौ झूठ का नहीं है खाता।
यदि किसी के भले के हेतु,
झूठ मुझे है बोलना पढ़ता।
उसको भला मैं झूठ क्यों समझू,
जो नजरों में मेरी है सच का भ्राता।
कान्हां ने जब माखन खाया,
फिर माता यशोदा को समझाया।
कहने लगे कान्हा मैया से,
सुन मैया मैं हूँ तेरा कन्हैया।
मैया मेरी मैं सच कहता हूँ,
हाँ, मैं ने ही माखन खाया।
मैया मेरी, मैं ने ही माखन खाया।
सुनकर भी जब माँ समझ न पायी,
ने ही माँ की समझ से नहीं हो गया।
एक छोटी सी समझ की फेर से,
सच मानो सच में झूठ हो गया।
बोली बहुत झूठ कहते हो कन्हैया,
आज बचा नहीं पायेंगे तुमको दाऊ भैया।
बहुत शरारती थे माना कन्हैया,
लोगों ने नाम दिया छलिया।
दुष्टों से सबकी रक्षा करते,
कैसे भला वो थे छलिया।
चंचलता से खेल समझकर,
जब दुष्टों का संहार किया।
अपनी लीलाओं को दिखाकर,
ब्रज गोकुल मथुरा को मोह लिया।
कैसे ना करते प्रेम सभी जन,
जब ईश्वर ही प्रेमी हो गया।
सचमुच सच कहना आता है,
झूठ मुझे नहीं भाया।
रचनाकार- श्रीमती सुनीता बोपचे सिवनी (म प्र)












