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कलयुग का वक्त


विधा- काव्य

वक्त का ये तकाजा है
कहीं कम कहीं ज्यादा है
मुद्दे हम चलने नही देंगे
रायता फैलने नहीं देंगे
जो बँट रहा है उसे छीन लेंगे
ना जिएंगे ना जीने देंगे
प्यास ना हो प्यासे ही रहेंगे
तड़फते है तड़फते ही रहेंगे
सुकून दूसरे का छीन लेंगे
गेहूं से घुन जैसे बीन लेंगे
हमारी नही तुम्हारी भी चलने ना देंगे
नींद सुकून की तुम्हे भी लेने नही देंगे
ना तुम दुनियाँ के मालिक ना हम होंगे
दुनियाँ जिसकी उस रब का भी नाम मिटा देंगे
तुम ना मरों हम मार देंगे
शीशे से अक्स तुम्हारा उतार देंगे
जब तक मिट्टी ना हो ना भजेगे मिट्टी का शरीर तेरा मिट्टी मे मिला देंगे
कलयुग है कलयुगी हवा ही चलाएंगे
अच्छाई को समूल बुराई से निपटायेंगे

स्वरचित एवं मौलिक
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र

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