विनम्र निवेदन आपके आशीर्वाद के साथ
जन्मदिवस पर ‘विद्रोही’ की विनती
उत्कृष्ट, शांत, अटपटे शब्दों के साथ
ना मैं कवि, ना ज्ञानी, ना कोई महारथी,
बस शब्दों का मजदूर हूँ, कलम का सारथी।
‘विद्रोही’ नाम है मेरा, पर दिल से ‘विनम्र’,
खड़ावदा की माटी का एक अदना सा पुत्र,
मैं शब्दों का सरल सूत्र हूँ।
31 मई 1975 को प्रथम बार धरा पर पदार्पण हुआ,
कालचक्र की गति से पचास वसंतों का अवगाहन हुआ।
31 मई को जन्म का मेला है,
जीवन की बगिया में एक और फूल खिला है।
ना केक कटेगा, ना शोर-शराबा होगा,
बस अपनों के आशीष से जीवन आबाद होगा।
बड़ों के चरणों की धूल माथे पर चाहूँ,
‘चिरंजीवी भव वत्स’ – बस इतना सुनना चाहूँ।
तुम्हारी दुआएं मेरी ढाल बन जाएं,
जो कांटे बिछे पथ में, कुसुम बन जाएं।
छोटों से चाहूँ न उपहार, न माला,
बस एक मधुर सी ‘जन्मदिवस मंगलमय काका’।
तुम्हारी निश्छल मुस्कान ही मेरा उपहार है,
तुम्हारा विमल स्नेह ही मेरा आधार है।
मैं अटपटा हूँ, निर्भीक हूँ, पर अंतस का स्वच्छ हूँ,
ना छल जानूँ, ना प्रपंच, बस ‘भारत’ का स्वप्नद्रष्टा हूँ।
गरोठ तहसील से निस्सृत ये स्वर हूँ,
मंदसौर की मृत्तिका पर अंकित एक प्रखर हूँ।
तो दे दो आशीष कि लेखनी अविरल बहे,
सत्योक्ति से ये ‘विद्रोही’ कभी न झुके, न ढहे।
दे दो स्नेह कि आयु भले व्यतीत हो जाए,
पर राष्ट्रभक्ति का ये उत्तुंग ज्वार न थमे, न घट जाए।
ना वैभव चाहूँ, ना संपदा, ना मान-प्रतिष्ठा,
बस इतना मिल जाए – सबका वात्सल्य, सबकी निष्ठा।
एक क्षुद्र मानव हूँ, विराट अभिलाषा लिए,
जन्मदिवस पर कर-पात्र फैलाए खड़ा हूँ, आशीर्वचनों की तृषा लिए।
जय भारत, जय भारती
कवि: गोपाल जाटव ‘विद्रोही’ खड़ावदा
तहसील गरोठ, जिला मंदसौर, मध्यप्रदेश, भारत देश
हिन्दी तिथि: ज्येष्ठ दितिय अमावस्या, विक्रम संवत 2083












