
कैसी विडंबना है भगवन,
जिन्हें जीते जी सम्मान नहीं।
जिन ने परिवार को पाला था,
अब उनके लिए मकान नहीं।।
जिन ने सारी उम्र खपा दी,
बच्चों को सफल बनाने में।
तन्हा उनको अब छोड़ दिया,
बस खोये रहे जमाने में।।
जरा सोचो औ ध्यान करो,
कितने अरमानों से पाला था।
भले भूखे ही खुद सो जाए,
पर तुमको दिया निवाला था।।
ये क्या है..? एक कौआ है.. तुम
हर बार ये दोहराते थे।
औ बड़े प्रेम से प्रति उत्तर
हर बार पिता से पाते थे।।
अब एक बार पिता पूछ लिये,
तुम उन पर यूं चिल्लाते हो।
बस संभल के जाना मेरे बेटे,
इतनी बात पे चिड़ जाते हो।।
सोचो कितनी कुर्बानी दी,
उम्र भर ताना बाना बुना।
बच्चों को तकलीफ न हो,
खुशियों की खातिर कितना सुना।।
मातु-पिता से बढ़कर जग में,
होता कोई हमदर्द नहीं।
मातु-पिता सेवा से बढ़कर,
इस दुनियाँ में सत्कर्म नहीं।।
मातु-पिता जग ईश्वर ही है,
चरणों में सब तीर्थ धाम है।
तुम कैसे भूल भी सकते हो,
तुम्हे काया मिली औ नाम है।
स्वर रचित एवं मौलिक
भगवानदास शर्मा “प्रशांत”
शिक्षक सह साहित्यकार
इटावा उत्तर प्रदेश












