जो धर्मशास्त्र ब्राह्मण को श्रेष्ठ सिद्ध करते हैं, ब्राह्मण के कर्तव्यच्युत होने की स्थिति में उन्हीं धर्मशास्त्रों के अनुसार जो दंड ब्राह्मण हेतु निहित है ।।
शराबी, अभक्ष्यभक्षण करने वाले, राजनीतिक व्यक्तियों की जूतियां उठाने वाले ब्राह्मण जिन मंचो पर ब्राह्मण एकता और जय परशुराम के नारे लगाते हैं, उनके लिए इस लोक और परलोक में स्पेशल व्यवस्था कर रखी है धर्मराज ने ।।
सम्भवत: ये पतित {दिखावावाले} ब्राह्मण जो फरसा उठाकर भगवान् परशुराम जी के प्रतिनिधि बनने का प्रयास करते हैं,
इनका सामर्थ्य इतना भी नही कि कभी धोखे से ही चिरंजीवी भगवान् परशुराम दर्शन दें तो उनके तेज का एक अंश भी संभाल पाने लायक ब्राह्मणत्व इनमें शेष हो ।।
आद्य जगद्गुरु भगवान श्रीशंकराचार्य जी श्रीमद्भगवद्गीता पर भाष्य लिखने से पूर्व उपोद्घात में लिखते हैं—
“ब्राह्मणत्वस्य हि रक्षणेन रक्षितः स्याद् वैदिको धर्म: तदधीनत्वाद् वर्णाश्रमभेदानाम्।”
‘ब्राह्मणत्व के रक्षा से ही वैदिक धर्म रक्षित है, सभी वर्णाश्रम उसीके अधीन है।’
इसीलिए कहता हूँ ब्राह्मणत्व की रक्षा करें, क्योंकि ब्राह्मणत्व के रक्षा से ही ब्राह्मण सहित सभी वर्णाश्रमों की रक्षा सम्भव है, और वर्णाश्रम-धर्म की रक्षा ही सनातन धर्म की रक्षा है ।।
विदेशी आक्रांताओं द्वारा मन्दिरें तोड़ दिये जाने से, ग्रन्थागार जला दिये जाने से भी जितना सनातन धर्म को हानि नहीं हुआ, उससे करोड़ो-अरबों गुणा अधिक हानि वर्तमान समाज में वर्णाश्रम धर्म त्याग से हो रहा है ।।
हमारे लिए मनु जी महाराज द्वारा स्थापित ये उपदेश ही सिरोधार्य होना चाहिए —–
“आचारः परमो धर्मः श्रुत्युक्तः स्मार्त एव च ।
तस्मादस्मिन्सदा युक्तो नित्यं स्यादात्मवान्द्विजः।।
【मनुस्मृति १/१०८】
मात्र नाम के ब्राह्मण नही प्रत्युत ब्राह्मण मे ब्राह्मणत्व होना ही चाहिए ।।











