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बारिश

आज दोपहर जब जला रही थी,
गर्मी भी हद से ज्यादा आज़मा रही थी।
बिजली भी घर से जब भाग गई,
मन में बेचैनी जाग गई।
तन जैसे कि जलता रहा,
संग उसके पसीना बहता रहा।
लगता ऐसे कि अब तो,
अंदर घर के रहना नहीं।
बाहर जब जाकर देखा तो,
धूप पास नहीं आना कह गई।
..
देख मुझे इतने कष्टों में,
बादल को थोड़ी दया आई।
सूरज को उसने छुपा दिया,
फिर प्यारी क़ाली घटा छाई।
देख नजारा इतना सुंदर,
मैं भी घर से बाहर आयी।
जैसे ही मैं बाहर आई
कुछ बूँदों ने मुझे छुआ।
जब टपकी वह माथे पर मेरे,
तब मेरा मन फिर शांत हुआ।
धीरे धीरे उन बूँदों ने मुझे,
प्यारा ठंडा एहसास दिया।
..
पहली बारिश की ये बुँदे,
सबको राहत देती हैं।
माह जेठ का हमको जलाता,
बारिश ही है जो सुकूँ को देती है।
सावन के आते ही बारिश,
अपने यौवन पर आती है।
लहराती बलखाती वह तो,
अपना प्रेम सभी पर बरसाती है।
नहीं करती वह भेद किसी में,
सारी धरती को दुल्हन सा सजाती है।
रचनाकार- श्रीमती सुनीता बोपचे सिवनी (म प्र)

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