
तम्बाकू नहीं ,मौत की पुड़िया है,
सुनो ध्यान से भाई,
यह है मौत का कहर,
यह जो शौक पाल रखा है,
यह है धीमा ज़हर।
छोटी सी डिब्बी, पर ज़हर का है घोल,
ज़िंदगी छीन लेगी, ना मिलेगा मोल।
समझो यह बात, यह न कोई गुड़िया है,
तंबाकू नहीं, यह तो मौत की पुड़िया है!
सस्ते में बिकती है, पर कीमत बड़ी लेती है,
हंसते-खेलते घर को यह उजाड़ देती है।
पहले बनती है आदत, फिर मजबूरी बनती है,
अंदर ही अंदर फेफड़ों की सांसें यह छिनती है।
चूने के साथ जो तुम इसे मलते हो,
सच तो यह है कि तुम अंगारों पे चलते हो।
कैंसर की शक्ल में जब यह घर आती है,
पाई-पाई और खुशियां सब लूट ले जाती है।
धुएं में उड़ाते हो जो तुम अपनी कमाई,
सोचा है कभी? पीछे बच्चों ने क्या पाई?
वो तरसते हैं किताबों को, अच्छे खाने को,
और तुम फूंक रहे पैसा मौत को बुलाने को।
यह नशा नहीं, यह तो जीते जी खुदकुशी है,
छोड़ो इसे आज ही, इसी में सबकी खुशी है।
हाथ जोड़कर कहती रीना, अब तो होश में आओ,
इस ज़हरीली पुड़िया को जड़ से दूर भगाओ।
जागो रे भाई जागो, अब और ना देर करो,
तंबाकू को छोड़ो, अपनी ज़िंदगी से प्यार करो।
सांसें अनमोल हैं, इन्हें धुएं में ना उड़ाओ,
मौत की इस पुड़िया को आज ही दफ़नाओ…
रीना पटले, शिक्षिका
शासकीय हाई स्कूल ऐरमा कुरई
जिला सिवनी मध्यप्रदेश











