
बारिश तो हुआ लावारिस ,
न कोई जिसका वारिस ।
कभी अना तो कभी अति ,
जब मर्जी तभी है बारिश ।।
कभी जेठ में ही ये आषाढ़ ,
जैसे आ जाए भारी बाढ़ ।
कृषक श्रम पे पानी फिरे ,
या सूखा पड़े विपत गाढ़ ।।
कभी जेठ से आरंभ भादो ,
कभी भादो तक बने जेठ ।
किंतु बारिश मत निज नहीं ,
इंद्र बनता इसका है मेठ ।।
इंद्र हों जैसे गहरी निद्रा में ,
बारिश की हुई है मनमानी ।
कभी होती है खूब बारिश ,
कभी हल्का भी आनाकानी ।।
जैसे छूट दे रखा हो इंद्र ने ,
जैसी मर्जी वैसा कर लो ।
ला दो धरा पर बाढ़ तुम ये ,
या सूखा दे मन को भर लो ।।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार











