कवि: गोपाल जाटव ‘विद्रोही’ खड़ावदा
जब चाँद अपने शबाब में आसमान पर छा जाता है,
प्रकृति का अनमोल उपहार धरती पर आता है।
तब समंदर का पानी ज्वार-भाटा के रूप में,
चाँद से मिलने की एक ललक दिखलाता है।
यह अनोखा रिश्ता असली प्यार की परिभाषा बतलाता है,
जो करोड़ों किलोमीटर दूर होने के बाद भी,
चाँद और समंदर का पानी एक-दूजे से मिलने को,
अजीब सी ललक लिए हर पल मचल जाता है।
समंदर के सीने में भी हर पल लहर के रूप में उठती,
चाँद से मिलने की झलक दिखती।
प्रकृति ने ही सच्चे प्यार की रच दी है परिभाषा,
समंदर के पानी और चाँद का रिश्ता ही,
जीवन जीने की जगाता है आशा।
यह प्रकृति का अद्भुत है और अधूरा प्यार,
मिलन असंभव फिर भी, टूटता नहीं तार।
चाँद की चाँदनी समंदर पर बिछ जाती है,
पर बाहों में भरने को वो कभी आ नहीं पाती है।
ना शिकवा है समंदर को, ना शिकायत चाँद को,
दोनों जानते हैं मर्यादा का बंधन।
दूर से ही निहारना, दूर से ही पुकारना,
यही है इनके प्रेम का अटूट दर्पण।
सदियों से ये खेल चल रहा शाश्वत,
ना चाँद थका, ना समंदर रुका।
हर पूर्णिमा पर फिर वही उठान, वही तूफ़ान,
बता देता है जग को – प्रेम ना माने कोई विधान।
तो ऐ इंसान, तू क्यों छोटी बात पर रिश्ते तोड़ देता है?
सीख ले इनसे वफ़ा, जो बिना मिले ही प्यार निभाता है।
दूरी मायने नहीं रखती, अगर मन का मेल हो,
अधूरा होकर भी ये इश्क़, सबसे मुकम्मल है।
जय प्रकृति, जय प्रेम
कवि: गोपाल जाटव ‘विद्रोही’ खड़ावदा
तहसील गरोठ, जिला मंदसौर, मध्यप्रदेश, भारत देश










