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कैसे कटेगी सिगरी रात बलम तुम हुक्का छोड़ो

डाक्टर दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक

यह ब्रजलोकगीत हमारी संस्कृति की पहचान है। एक ब्रज की गोपी अपने पति से अनुरोध कर रही है कि आप हुक्का छोड़ दो। इसके बहुत नुकसान होते है।
नुकसान हुक्के से ही नहीं है। यह गुटखा, खैनी, सिगरेट, बीड़ी, सिगार, ई सिगरेट, हर उस जहर की है जो धुएँ या लार के रास्ते तुम्हारे जीवन में उतरता है। तुम समझते हो कि यह बस आदत है, पर विज्ञान कहता है कि यह धीमा विष है जो शरीर के हर कोने को खाता है।

गुटखा और खैनी जब हम दाँतों तले दबाते हो तो सबसे पहले मुँह का कवच टूटता है। मसूड़े गलते हैं, दाँत गिरते हैं, जीभ का स्वाद मर जाता है। फिर आता है सबम्यूकस फाइब्रोसिस। मुँह खुलना बंद हो जाता है। रोटी का कौर भी गले से उतरना कठिन हो जाता है। यही रास्ता मुँह के कैंसर की ओर ले जाता है। होठ, जीभ, गाल, तालू, गला, हर जगह कैंसर पनप सकता है। भारत में मुँह का कैंसर सबसे अधिक तंबाकू चबाने से होता है। सर्जरी में जबड़ा काटना पड़ता है, चेहरा बिगड़ जाता है, बोल बंद हो जाता है। सोचो बलम, जिस मुँह से तुमने बच्चों को लोरी सुनानी थी, उसी मुँह से अब नली से खाना जाएगा।

सिगरेट और बीड़ी का धुआँ जब भीतर जाता है तो केवल फेफड़ा नहीं जलता। साँस की नली, श्वास नली, गले का कैंसर जन्म लेता है। धुआँ रक्त में मिलकर मूत्राशय तक जाता है और वहाँ भी कैंसर बनाता है। अग्न्याशय का कैंसर, गुर्दे का कैंसर, गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर, पेट का कैंसर, भोजन नली का कैंसर, यकृत का कैंसर, रक्त का कैंसर जिसे ल्यूकेमिया कहते हैं, ये सब तंबाकू से जुड़े हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बताया है कि तंबाकू में 70 से अधिक ऐसे रसायन हैं जो सीधे कैंसर पैदा करते हैं। निकोटीन तुम्हें लत लगाता है और उसके साथ बेंजोपाइरीन, नाइट्रोसामाइन, आर्सेनिक, कैडमियम, फॉर्मेल्डिहाइड जैसे विष तुम्हारे डीएनए को तोड़ते हैं। कोशिका पगला जाती है और अनियंत्रित बढ़ने लगती है। इसी को कैंसर कहते हैं।

हुक्का को लोग कम हानिकारक समझते हैं। यह सबसे बड़ा भ्रम है। एक घंटे हुक्का पीना सौ सिगरेट के धुएँ के बराबर होता है। पानी धुआँ छानता नहीं, केवल ठंडा करता है जिससे तुम और गहरा कश लेते हो। कार्बन मोनोऑक्साइड, भारी धातुएँ, टार, सब सीधे फेफड़े में जाते हैं। सिगार भी वही काम करता है। उसका धुआँ भले भीतर न खींचो, मुँह और गले में तो रहता ही है। उससे भी होठ, मुँह, गले, भोजन नली और स्वर यंत्र का कैंसर होता है।

कैंसर के अलावा भी शरीर का कोई अंग नहीं बचता। हृदय की नलियाँ सिकुड़ती हैं तो हार्ट अटैक आता है। मस्तिष्क की नस फटती है तो लकवा मार जाता है। पैरों की नस बंद होती है तो गैंग्रीन होता है और पैर काटना पड़ता है। आँखों की ज्योति जाती है, मोतियाबिंद होता है। पुरुषों में नपुंसकता आती है, स्त्रियों में गर्भ नहीं ठहरता या बच्चा कमजोर पैदा होता है। हड्डियाँ खोखली होती हैं। बुढ़ापा समय से पहले आता है। त्वचा पर झुर्रियाँ पड़ती हैं, चेहरा मुरझा जाता है। जीवन के सारे रंग एक एक करके बुझते जाते हैं।

बलम, यह रात जो तुम धुएँ में काट रहे हो, यह रात किसी अस्पताल के बिस्तर पर कट सकती है। कीमोथेरेपी की सुई, रेडिएशन की जलन, सर्जरी का दर्द, ये सब उस एक कश का ब्याज हैं जो तुम आज ले रहे हो। पर अभी भी समय है। जिस दिन तुम छोड़ते हो, उसी दिन शरीर मरम्मत शुरू कर देता है। बीस मिनट में रक्तचाप सामान्य होता है। बारह घंटे में रक्त में कार्बन मोनोऑक्साइड निकल जाता है। दो दिन में स्वाद और गंध लौटते हैं। एक साल में हृदय रोग का खतरा आधा हो जाता है। दस साल में फेफड़े के कैंसर का खतरा आधा रह जाता है। पंद्रह साल में शरीर ऐसा हो जाता है मानो तुमने कभी तंबाकू छुआ ही न हो।

इसलिए बलम, गुटखा थूको, खैनी फेंको, सिगरेट बुझाओ, हुक्का तोड़ो, सिगार से नाता तोड़ो। सिगरी रात अब कटेगी जीवन गढ़ने में, कैंसर गिनने में नहीं। यदि छोड़ने में कठिनाई हो तो डॉक्टर से मिलो। निकोटीन रिप्लेसमेंट, परामर्श, दवाएँ, सब उपलब्ध हैं। राष्ट्रीय तंबाकू निषेध 1800 11 2356 पर बात करो।

याद रखो, तंबाकू छोड़ना कमजोरी नहीं, सबसे बड़ा बल है। जिसने अपनी लत को हराया, उसने यमराज को भी हरा दिया। अब रात कटेगी बच्चों की हँसी से, माँ की आरती से, देश के निर्माण से। धुआँ गया तो कैंसर गया। कैंसर गया तो जीवन के सारे रंग लौट आए। उठो बलम, आज ही छोड़ो। तुम्हारा जीवन अनमोल है।

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