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मां का आँचल, पिता का साया

विषय – माता​-पिता
विधा। – गीत

कभी न माँगा अपने लिए कुछ,
सब कुछ हम पर वार दिया,
खुद को खोकर माता-पिता ने,
हम बच्चों को सँवार दिया।

इनके साए में रहकर ही,
महकी जीवन-क्यारी है,
माता-पिता की मूरत जग में,
भगवान से भी प्यारी है।

​गीले में खुद सो जाती थी,
सूखे में हमें सुलाती थी,
हल्की सी जो ठेस लगे तो,
माँ व्याकुल हो जाती थी।

लोरी गाकर नींद बुलाती,
चंदा मामा को बतलाती,
अपने हिस्से का हर निवाला,
हँसकर हमें खिलाती थी।

उसकी गोद में सिमट के देखी,
दुनिया सबसे न्यारी है,
माता-पिता की मूरत जग में,
भगवान से भी प्यारी है।

​ऊँचे सपनों को छूने को,
जिसने कंधा अपना दिया,
हम रोए तो हमें हँसाने,
खुद का चैन गंवा दिया।

फटे थे जूते पैर में उसके,
पर हमको नए दिलाते थे,
मेहनत की उस धूप में जलकर,
शीतल छाँव बनाते थे।

स्वाभिमान से जीना सिखाया,
वो पहचान हमारी है,
माता-पिता की मूरत जग में,
भगवान से भी प्यारी है।

​शीश झुकाएँ इनके आगे,
ये ही हमारे तीर्थ हैं,
इनकी दुआएँ साथ न हों तो,
सब अधिकार व्यर्थ हैं।

रहें सलामत उम्र भर दोनों,
भगवान से प्रार्थना करते हैं,
चेहरे पर इनके मुस्कान रहे,
बस यही आरज़ू रखते हैं।

खुद को खोकर माता-पिता ने,
हम बच्चों को सँवार दिया,
कभी न माँगा अपने लिए कुछ,
सब कुछ हम पर वार दिया,

रीना पटले शिक्षिका

शासकीय हाई स्कूल ऐरमा कुरई
जिला सिवनी मध्यप्रदेश

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