
पत्नी केवल जीवन संगिनी नहीं,
घर की धड़कन होती हैँ।
अपने सपनो को पीछे रखकर,
सब की खुशियों में खोती है
सुबह सबेरे उठ जाती हैँ,
सबके काम सावरती है।
अपने दर्द को छुपाकर भी,
चेहरे पर मुस्कान सजाती है।
माँ बाप का आँगन छोड़कर,
नए घर को अपना बनाती हैँ।
अजनबियों को अपना बना कर,
हर रिश्ता दिल से निभाती हैँ।
थक जाती हैँ दिन भर लेकिन,
शिकवा कोई करती नहीं।
परिवार के खातिर जीती हैँ,
अपनी चाहत गिनती नहीं।
पति के सुख में सुख पाती,
दुख में उसका साथ निभाती।
अंधी हो या कठिन समय हो,
हिम्मत बन कर राह दिखाती।
ऐसी नारी का मान करो,
उसके त्याग को पहचानों।
जो जीवन को स्वर्ग बनाती,
उस पत्नी का सम्मान करो।
बच्चों की पहली गुरु बनती,
संस्कारों से जीवन सजाती है।
गलती पर डाँट भी देती है,
पर दुआओं में सबको सजाती है।
त्यौहारों की रौनक उसी से,
खाली घर को महकाती है।
मेहमानों की खातिरदारी में,
खुद भूखी भी रह जाती है।
बूढ़े सास-ससुर की लाठी बन,
बेटी बनकर फर्ज निभाती है।
अपने माँ-बाप को याद करके,
आँसू चुपके से बहाती है।
रात को सबसे बाद में सोती,
सबकी चिंता में जागती है।
सुबह सबसे पहले उठकर,
फिर वही ज़िम्मेदारी उठाती है।
बीमार पड़ जाए तो भी देखो,
बिस्तर से हुक्म चलाती है।
“दवा ली?” “खाना खाया?”
पूछ-पूछ सबको थकाती है।
साड़ी के पल्लू में बाँधे रखती,
पूरे घर की जिम्मेदारी।
लक्ष्मी बन कर बरकत लाती,
अन्नपूर्णा बन सबको खिलाती।
ऐसी नारी को क्या दूँ मैं,
शब्द भी पड़ जाते हैं छोटे।
हीरे-मोती धन-दौलत क्या,
उसके आगे लगते हैं खोटे।
बस एक वादा कर सकता हूँ,
साथ निभाऊँगा हर हाल में।
तू मेरी धड़कन है प्रिये,
रखूँगा तुझे अपनी ख्याल में।
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)












