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हनुमंत स्तुति

पावन संकट हरन तुम, महिमा अतिशय पार।
करहु कृपा अब देव तुम, नैया कर दो पार ॥

अंजनी-सुत संकट-हरन, पावन तेरी राह।
राम भक्ति के भाव से, हर लो मन की चाह ॥

राम-राम रस बह रहा, मधुर बोल ही बोल।
जीवन रस जो घोल दे, मिश्री जैसे घोल ॥

हिमगिरि से बूटी लाए, लक्ष्मण हित तुम आज।
सबका संकट काटती, रख कर जग की लाज ॥

व्याकुल भारी जग भयो, थकित भई सब चाल।
संकट-मोचन कर गयो, पावन यह त्रिकाल ॥

मिटते सब ही कष्ट हैं, जो भी शरण हिं आत।
शरण तुम्हारी जो आए, झटपट ही मुस्कात ॥

भक्ति की उस तान पे, जग है रहा लुभाय।
नाम तिहारा जो जपे, पाहन भी पिघलाय ॥

आरत सजे सदीप की, गूँजे जय-जयकार।
चरणन आ जो शीश धरे, खुलते मोक्ष-दुआर ॥

चरण कमल की धूलि जो, मस्तक पर लग जाय।
सौ-सौ जनम के पाप भी, क्षण में ही धुल जाय ॥

अंतिम अरज स्वीकार लो, हे अंजनी के राय।
शरण तिहारी आ गिरे, दे चरणों की छाय ॥

जो यह पाठ करे सदा, ग्यारह दोहा प्रीत।ऋद्धि-सिद्धि सुख संपदा, होवे जग में जीत ॥

रजनी कुमारी
लखनऊ उत्तर प्रदेश

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