
एक सवाल जो राख से उठता है
सुलगती सी उम्मीदों में उलझ कर रह गए देखो,
मौत के व्यूह में बच्चे सिमट कर रह गए देखो।
चीखती सी आवाजें बढ़ते-बढ़ते थम गईं लेकिन,
कई कसमें कई वादे झुलस कर रह गए देखो।
जो खिलौने कल तक हँसते थे आँगन में,
वो आज कोने में सहम कर रह गए देखो।
माँ की लोरी अधूरी रह गई इस बार,
और बाप के कंधे भी खाली घर रह गए देखो।
पूछती है राख हर आने-जाने वाले से,
क्या मेरा कुसूर था जो मैं जल गई देखो?
नेता आए, अफसर आए, मोमबत्तियाँ जलीं,
फिर सब अपनी-अपनी बारी कर रह गए देखो।
अब बस ये दुआ है उस खुदा से,
कि फिर कोई माँ यूँ ना बिलखे देखो।
वो मासूम आँखें जो ख्वाबों से भरी थीं,
कफ़न में लिपट कर ना चुप रहें देखो।
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी










