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सवाल-ए-इश्क़

जहाँ दिल हारकर भी जीत गया

आगे सफर था, पीछे हमसफ़र था।
ठहरता तो सफर छूट जाता,
बढ़ता तो हमसफ़र छूट जाता।
मंज़िल की भी हसरत थी,
और उससे मोहब्बत भी थी।
ए दिल, अब तू ही इंसाफ़ कर,
उस लम्हे में कहाँ जाता?
तकदीर का सफर भी था,
और उम्र भर का हमसफ़र था।
रुकता तो बिछड़ जाता,
चलता तो बिखर जाता।

फिर एक शब तन्हाई में सोचा,
किसे खोकर क्या पाना है तुझे?
मंज़िलें तो फिर भी मिल ही जाएँगी,
पर हमसफ़र क्या हर बार मिलेगा?

ख्वाब तो टूटकर भी संवर जाते हैं,
पर भरोसा एक बार टूटे तो मर जाता है।
मैंने थाम लिया उसका हाथ आखिर,
मंज़िल से कहा, ज़रा सब्र कर अभी।

आज जब मुड़कर देखता हूँ पीछे,
ना रास्ता छूटा, ना साथी छूटा।
क्योंकि जो रूह से हमसफ़र होते हैं,
वो हर मंज़िल का पता बन जाते हैं।

तो ऐ दिल, अब सुन मेरा फैसला,
मैं वहीं गया जहाँ चैन मिला।
तकदीर का कारवाँ भी चल रहा है,
और बरसों का हमसफ़र भी साथ चल रहा है।

अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)

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