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सौदागर-ए-साहित्यजहाँ लफ़्ज़ बिकते हैं, रूह नहीं

वाह रे साहित्य के सौदागर,
तूने तो रूह को भी बेच खाया।
शायर के लहू से स्याही बनाई,
और हर कतरे का मोल लगाया।
तू कहता है “कला बिकनी चाहिए”,
मैं कहता हूँ कला जीनी चाहिए।
तूने जज़्बातों के ठेले लगाए,
और कीमत के बोर्ड भी टाँग दिए।

ग़ालिब की ग़ज़ल को तूने पैक किया,
प्रेमचंद के गाँव का रेट तय किया।
मीरा के भजन पर जीएसटी लगा दी,
और कबीर के दोहों को ब्रांड बना दिया।

तेरी दुकान में सब कुछ मिलता है,
बस ईमानदारी आउट ऑफ स्टॉक है।
शब्द सस्ते हैं, कागज़ महँगा है,
और शायर? वो तो फ्री का मजाक है।

सुन व्यापारी, एक बात कान खोलकर,
साहित्य मंडी नहीं, मरघट है।
यहाँ लोग मर-मर के ज़िंदा होते हैं,
तू ज़िंदा रहकर भी मरा हुआ है।

तेरे गोदाम में कविता सड़ रही है,
दीमक चाट गई उन जज़्बातों को।
तूने शायर को मंच दिया, पर भाड़े पर,
तालियों की गिनती कर के पैसे काट लिए।

पर सुन व्यापारी, वक्त का पहिया घूमेगा,
तेरी दुकान पर भी धूल जमेगी एक दिन।
क्योंकि शब्द मरते नहीं, बस सो जाते हैं,
और जब जागते हैं, तो तख्त पलट देते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)

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