यह कविता समाज के उन अनदेखे पहलुओं पर एक विनम्र दृष्टि है।
शीर्षक _लब्ज़ों की दुकान
चेहरे से पहचान नहीं होती इंसानों की,
मधुर भावों में लिपटे होते हैं इंसान।
फ़रेबी चेहरे पर मुस्कान लपेटे होते हैं,
पास आकर बनाते हैं अपनी पहचान।
हँसी के पीछे जो छिपे होते हैं राज,
उनकी नक़ाब भी होती है कर्ज़ समान।
समूहों की भी अपनी अदाकारी होती है,
किसी का कोई नहीं, फिर भी होंठों पर मुस्कान।
देखे हैं जलवे सामूहिक आत्माओं के,
नफ़रतों का भी देखा है एक संगठन।
गोरी, काली, गेहुँआ रंग कोई-सा हो,
लब्ज़ों को रस में लपेटकर सजाते हैं दुकान।
“तुकबंदी में लिपटी होती हैं चोंचलेबाज़ियाँ,
बेसुध आत्माएँ ही रहती हैं अनजान।
कूटनीतियाँ परोसने की अदा भी निराली होती है,
ढूँढ़ते हैं कुछ ऐसे लोग, कुछ ऐसे मकान।
जनहित बुरा मान जाता है समाज के दर्पण को,
लेखक की फितरत ही होती है सच का मेजबान।
रंजीता भारती श्री
सीतामढ़ी, बिहार
स्वरचित।










