
जब कोई चीज मुफ्त मिल रही हो,
तो समझना चाहिये कि इसकी कोई
बड़ी कीमत पाने वाले को चुकानी है,
उनकी आज़ादी भी छीनी जा सकती है।
नोबेल विजेता डेसमंड टुटू ने कहा था,
“जब मिशनरीज अफ्रीका में आए,
तो उनके पास केवल बाईबल थी,
और हमारे पास हमारी जमीन थी।”
उन्होंने कहा, हम आपके लिए प्रार्थना
करने आये हैं, तो हमने आखें बंद की,
आँखें खोलीं,हमारे हाथ में बाईबल थी,
उनके पास हमारी जमीन जायदाद थी।
जब सोशल नैटवर्क साइट्स आईं,
उनके पास फेसबुक व्हाट्सएप थीं,
हमारे पास आजादी व निजता थी,
विचारों व कल्पना की आज़ादी थी।
‘ये मुफ्त हैं’ उनके कहने से मैने आखें
बंद कर लीं, और जब खोलीं, हमारे
पास व्हाट्सएप फ़ेसबुक आदि थीं,
उनके पास मेरी आजादी व निजता थीं।
ज्ञान से शब्द समझ आते हैं और उस
अनुभव से उनके अर्थ समझ आते हैं,
जब कोई चीज मुफ्त होती है, उसकी
कीमत हम अपनी आजादी से चुकाते हैं।
मुफ़्त ही नहीं क़र्ज़ भी जिसे मिलता है,
उसकी पूरी आज़ादी छिन जाती है,
आदित्य अपनी मेहनत, अपने क़र्म,
पर भरोसा रखना उत्तम चाह होती है।
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ










