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क्या सचमुच?

क्या सचमुच वेदों-पुराणों का वो सार आज भी है?
जो सुना बुजुर्गों से, क्या वो चमत्कार आज भी है?
अनंत काल के जो स्वामी हैं, कालों के भी काल महाकाल,
क्या विष पीकर नीलकंठ बनने वाले वो हर-हर महाकाल आज भी हैं?

प्रलय करने वाले महाशंख का वो घोष कहाँ खो गया?
कनिष्ठ उंगली पर गोवर्धन उठाने वाला वो कान्हा कहाँ सो गया?
द्रौपदी की लाज बचाने जो दौड़े चले आते थे,
क्या मुरलीधर का वो करुणामय अवतार आज भी है?

कहते हैं कृष्ण जन्म पर सब देवता धरती पर आए थे,
फिर इन मासूम बच्चों में क्या भगवान के रूप न समाए थे?
अगर ये मासूम बच्चे भी उसी ईश्वर की अनमोल रचना थे,
तो जब वो तड़प रहे थे, क्या ईश्वर का वो संसार आज भी है?

जहाँ बच्चे पुकारते रहे भगवान को और अपने माता-पिता को,
कहाँ छुप गया था तब उनका वो धर्म और न्याय का वो?
हे माधव! तुमने ही तो कहा था—’सच्चे मन की पुकार पर मैं आऊंगा’,
क्या सचमुच ऐसा होता है, या बस किताबों में वो प्यार सिर्फ़ गुमराह करने को है?

ज्योति बरनवाल, नवादा (बिहार)

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