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मत बेचो साँसों का उजियारा

ओम कश्यप शैली में एक जन-जागरण गीत

मत बेचो साँसों का उजियारा,
मत चुनो नशे का अँधियारा।
जीवन ईश्वर का अनमोल उपहार,
इसे बचाना हम सबका है अधिकार॥

जिस आँगन में हँसी महकती थी,
आज वहाँ सन्नाटा रोता है।
एक नशे की छोटी-सी आदत,
पूरा घर ही खोता है।

माँ की आँखें राह निहारें,
पिता का विश्वास बिखर जाए।
बच्चों के सपनों की चिड़िया,
बिन पंखों के गिर जाए॥

मत बेचो साँसों का उजियारा…
मत चुनो नशे का अँधियारा॥

नशा न देता कोई मंज़िल,
बस छलता है हर उम्मीद।
क्षण भर का झूठा-सा सुख देकर,
जीवन भर की देता पीर।

युवा अगर संभलकर चलें तो,
देश का भविष्य सँवर जाएगा।
हर हाथ अगर कर्म से जुड़ जाए,
भारत फिर जग में छा जाएगा॥

आओ मिलकर दीप जलाएँ,
हर दिल में विश्वास जगाएँ।
नशा नहीं, शिक्षा का नाता,
प्रेम और सेवा का पथ अपनाएँ।

यही पुकार है हर घर-घर की,
यही देश की सच्ची शान।
स्वस्थ युवा, सुरक्षित बचपन,
यही बने हिंदुस्तान की पहचान॥

आज यही संकल्प हमारा—
हर जीवन हो फिर से प्यारा।
नशा नहीं, मुस्कान चुनें हम,
यही हो भारत का नारा।

“नशा छोड़ो, जीवन जोड़ो।
स्वस्थ युवा – सशक्त भारत!”

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