
कल रात सपने में सपना आई,
कल्पना को साथ लिए।
कुछ यादों के दिन तो कुछ,
वादों की सौगात लिए।
वही दिन, जिसमें मस्ती थी,
मिट्टी की खपरैल बस्ती थी।
न बिजली थी, न लाइट, न पंखा,
फिर भी हर चेहरा हँसता था।
आँगन में ठंडी छाँव बिछी थी,
माँ की ममता साथ खड़ी थी।
दादी की बातें, नानी की लोरी,
हर शाम सुनाती नई-सी कहानी।
बारिश में कागज़ की नावें थीं,
गलियों में अपनी ही ठाँवें थीं।
न दौलत का कोई घमंड था,
बस अपनों का ही आनंद था।
सुबह की चिड़ियों का संगीत था,
हर रिश्ता कितना पवित्र था।
आज सब कुछ होकर भी लगता है,
कुछ तो पीछे छूट गया।
कल रात सपने में सपना आई,
आँखों को फिर नम कर गई।
बचपन की वो छोटी-सी दुनिया,
दिल में फिर से घर कर गई।
आज मेरी बस्ती कहीं खो गई,
वो हँसी जाने कहाँ सो गई।
न वो गलियाँ, न वो यार मिले,
न बचपन के फिर त्योहार मिले।
मिट्टी की वो सोंधी खुशबू,
अब शहर की धूल में खो गई।
आज मेरी बस्ती कहीं खो गई,
पर दिल में उसकी यादें संजो गईं।
मैं अपनी खुशियाँ तलाशने अक्सर निकल जाता हूँ,
अपना ही पता मालूम है मुझे,
फिर भी खुद को ढूँढ़ने निकल जाता हूँ।
भीड़ में चेहरों को नहीं,
अपने खोए हुए एहसासों को तलाशता हूँ।
मंज़िल की चाह कम है,
सफ़र में खुद से मिलने निकल जाता हूँ।
शायद कहीं बचपन अब भी मेरा इंतज़ार करता हो,
उसी उम्मीद में हर बार
अपनी बस्ती की ओर निकल जाता हूँ।
क्योंकि कुछ घर नक्शों पर नहीं मिलते,
वे सिर्फ़ यादों में बसे रहते हैं।
और कुछ लोग कहीं नहीं खोते,
वे बस हमारे बचपन में रह जाते हैं।
आर एस लॉस्टम












