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आषाढ़ के बादल

यह फितूर हि तो है,
तो है किसका,
लोग उसे पहचानते नहीं हैं

बिन पिए झूमके निकलता है बादल ,

यह कैसा नशा है जानते नहीं हैं

देखो खुमारी किसकी चढ़ीं है उसको
नशा है किस शराब का,
कोई जानते हि नहीं हैं।।

इसमें भीगने से बदन से खुश्बू आती है
हवाएं महकती है,

फिजाओं में रंगत भर जाती है

शुमारी भरके दामिनी दमकती है,
अंगड़ाइयां लेके चले बदलियां,

जब वो आए तो आतिश बाजीयां होती है,
गगन से तबर्रुक बरसता है
उसके सामने तो आफताब भी पर्दें में उतर जाए,
चांद तारे नज़र नहीं आए,
उनके जलवे निराले हैं,
भीगते है जीभर के,
बदन बन्धन में नहीं रहता है,
मरू सागर में बदल जाएं ,
जवानी जलके निखरती है
जिस्म उफनती नदियां हुई हों जैसे,

हसरतें प्यासी हुई है फिर से रातों में,
कसक कड़कती बिजलियां है जैसे,,
धरती की धधकती ज्वाला बुझाने को,
आसमां झुमके बरसता है बरसों की प्यास बुझती है,
इस मदहोश बरसातों में
मस्ती
की नज़ाकत को पहचानते नहीं है


अशोक सुमन
भवानी मंडी (राज.)

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