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प्रेम; अदृश्य सेतु

प्रेम उस वृक्ष का नाम नहीं जिसकी जड़ें स्वार्थ की मिट्टी में पलती हों। वह तो आकाश में उगने वाला कल्पतरु है, जिसकी जड़ों तक केवल निर्मल भाव पहुँचते हैं। छल, कपट, अपवित्रता और अहंकार उसकी छाया में प्रवेश करते ही अपना अस्तित्व खो देते हैं। जैसे अंधकार सूर्य के सम्मुख स्वयं को सिद्ध नहीं कर सकता, वैसे ही स्वार्थ प्रेम के सामने टिक नहीं सकता।

प्रेम नदी नहीं कि किसी सागर तक पहुँचकर समाप्त हो जाए; वह तो वह वर्षा है जो स्वयं बादल भी है, स्वयं धरती भी और स्वयं हरियाली भी। उसे किसी बाहरी सिंचन की आवश्यकता नहीं होती। उसकी जड़ों तक पहुँचने वाला प्रत्येक अश्रु, प्रत्येक स्मृति और प्रत्येक निष्काम भावना अमृत बन जाती है। इसलिए प्रेम कभी सूखता नहीं; वह ऋतुओं का विषय नहीं, चेतना का स्वभाव है।

जो प्रेम दूरी से टूट जाए, वह साथ का अभ्यस्त था; जो निकटता से बदल जाए, वह आकर्षण था। प्रेम न दूरी से घटता है, न निकटता से बढ़ता है। वह तो उस ध्रुवतारे की भाँति है, जो यात्राएँ बदलने पर भी दिशा नहीं बदलता।

कहा जाता है कि बिछोह प्रेम की परीक्षा है; परंतु जहाँ प्रेम अपने शुद्धतम स्वरूप में जागृत हो जाता है, वहाँ बिछोह का अस्तित्व ही नहीं बचता। शरीर दूर हो सकते हैं, पर अनुभूति कभी विस्थापित नहीं होती। वहाँ स्मृतियाँ अतीत नहीं रहतीं, वे वर्तमान की स्पंदन में निवास करने लगती हैं।

ऋचा चंद्राकर “तत्वाकांक्षी”
कौन्दकेरा महासमुंद छत्तीसगढ़

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