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कर्म ही भाग्य का विधाता

_गंगा नहाने से कोई निर्मल नहीं होता,
दुखी जन श्राप से कोई निर्मल नहीं होता।
हमारे भाग्य का यदि कर्म से होता ना निर्धारण,
राम का वन गमन, सीता के सांग में छल नहीं होता।

कर्म की स्याही से ही तकदीर लिखी जाती है, मांगने से कटोरी नहीं, कमाने से तिजोरी भरती है। सूरज भी रोज़ उगता है, अपने कर्म के बल पर, वरना अंधेरे का राज, सदा के लिए चलता है।

भाग्य वो बीज है, और कर्म पानी, बीज कितना भी अच्छा हो, पानी न मिले तो सूख जाता है। इसीलिए कहते हैं, मेहनत करो, क्योंकि किस्मत, खुद मेहनती का साथ देती है।

इतिहास के पन्ने पलटो, तो हर जगह कर्म की जीत मिलेगी। कौरवों के सौ थे, पांडव पांच ही थे, पर धर्म और कर्म साथ था, तो जीत पांच की हुई। लंका का राजा रावण, चारों वेदों का ज्ञाता था, पर अहंकार और अधर्म ने, उसे मिट्टी में मिला दिया।

अर्जुन भी कुरुक्षेत्र में, हथियार रखकर बैठ गया था, अगर कृष्ण उसे, “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” का ज्ञान न देते। थॉमस एडिसन ने, 1000 बार असफल होकर भी हार नहीं मानी, तभी जाकर, दुनिया को बल्ब की रोशनी मिली।

आज हम कहते हैं, “मेरा नसीब खराब है”, पर सच ये है, कि हमने नसीब बनाने के लिए, मुट्ठी नहीं खोली। जो लोग पसीना बहाते हैं, उन्हीं के हाथों में, कलम और ताज आता है। जो सिर्फ किस्मत कोसते हैं, उनके हाथ में, सिर्फ अफसोस रह जाता है।

_इसलिए उठो, और अपने सपनों के लिए लड़ो,
क्योंकि लिखा हुआ भी मिट जाता है,
और मिटा हुआ भी, लिखा जा सकता है…
बस कर्म की कलम, चलनी चाहिए।

सर्वाधिकार सुरक्षित मौलिक अधिकार एवं अप्रकाशित रचनाएँ

अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि, व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर, नागपुर (महाराष्ट्र)


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