
कविता की रचना, पाठक का
ख़ुश होना ही, कवि का सम्मान है,
यह असाधारण क्षमता है, ईश्वर
प्रदत्त है, उसका दुर्लभ दान है।
दुनिया के किसी विद्यालय में,
किसी विश्वविद्यालय में,
काव्य- कला की शिक्षा,
शायद कहीं दी ही नहीं जाती।
विद्यार्थी और शिक्षक गण,
कविता पढ़ते व पढ़ाते हैं,
कविता पर रचे गए प्रश्नों के
उत्तर दे, परीक्षायें करवाते हैं।
पर क्या वे कविता के मूल की
उचित व्याख्या कर पाते है ?
वे सब इस संदर्भ में अपने आप
को सर्वथा अनभिज्ञ ही पाते हैं।
काव्य रचना की निपुणता हर
एक में कहाँ आ पाती है,
ईश्वर की महिमा है, कि
माँ सरस्वती पथ दर्शाती है।
कवि की कविता मात्र शब्दों का
स्वरबद्ध एक गुच्छ नही होता,
कवि की कल्पना, कवि का सृजन-
शौक़ गीता सा सार भी होता है।
अनभिज्ञ मैं कविता के स्वरों की
मिठास का स्वाद तो पा जाता हूँ,
पर क्या काव्य के मूल को समझ
कर शाश्वत वर्णन कर पाता हूँ ?
कविता की रचना धर्मिता तो प्रेमी
पाठक-मन को स्पर्श यूँ करती है,
कि अंतर्मन को झकझोर कर शरीर
के रोम रोम को उद्वैलित करती है।
प्रक्षेपास्त्र जैसे दुश्मन के निशाने
पर तीब्रतम प्रहार मर्दि-गर्द करता है,
भीष्म प्रतिज्ञा सा निश्चित लक्ष्य,
त्वरित गति से लक्ष्य भेद करता है।
कविता का मूल तत्व शान्ति व
संतोष से जीना भी सिखाता है,
जीने की सहज राह, जीने की
कला, ज्ञान विज्ञान स्वर गाता है।
कवि की कविता का, उसके
काव्य तत्व का कोई मोल हो न हो,
लाखों दिलों को छू कर, झकझोर
कर काव्य के शौर्य का गुण गाता है।
संस्कृत से सुशोभित वर्ण- स्वर,
धवल पृष्ठ पर यूँ सजाता कवि,
स्वशरीर रचित, इतिहास जनित
मन से मानव उपजाता कवि।
वह पहले ऋचा था, फिर छन्द हुआ
और आज वैचारिक गद्य-पद्य बन,
जीवन रूपी जल की सतह पर,
अग्नि प्रज्ज्वलन करवाता कवि।
कविता का अभिप्राय, कवि का
ज्ञान, समाज को ज्ञान का दान,
दुर्लभ तो है पर, कल्पना की
ऊँचाइयों से समर्पित करवाता कवि।
कवि और कविता की महिमा में जो
भी लिखूँ, जितना लिखूँ कम ही होता है,
जहाँ न जाय रवि, वहाँ जाय कवि,
आदित्य इसका मोल-अनमोल होता है।
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र,
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’’
‘विद्यासागर’, लखनऊ













