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दिल कि कसीस

आंखों में नमी और दिल में खुशियां,

इस नज़ारे को क्या नाम दूं,

जुबां से कहुं या आंखों से कहुं,

दिल का, दिल को,
किस तरह पैगाम दूं,

जलें हुए घर को समझाऊं कैसे,

कि आग ने सभी के सामने माफी मांग ली है,

राख हुए घर को किस तरह फिर से सपनों जैसा कैसे बनाऊं,

मुठ्ठी के बिच भर कर राख फिर से कैसे घर को सजाऊं,

इस दिल को किस मुंह से समझाऊं,
इस मन को कैसे बहलाऊं ,

गले मिलकर तो ऐसा लगता है,
मगर राहत भरी रातें कहां से लाऊं,

सुकून कि छांव में आ गए हैं ,
मगर यादें रह रह कर तड़फाती है,

वो हंसीं लम्हे मुझे छुपके छुपके रुलाने आ जाते हैं है,

इस दिल को मैंने बहुत समझाया,

पर आंखों को मैं समझाऊं कैसे।

बरसती है यह हर घड़ी हर पल,

इस आंख के सैलाब को कहां जा कर छुपाऊं

अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)

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