
नन्ही-सी मुस्कान में, संसार समाया है,
माखन-सी मासूमियत ने मन को रिझाया है।
मोरपंख सिर पर, अधरों पर मधुर मुस्कान,
हाथों में बाँसुरी, जैसे स्वयं विराजे भगवान।
नैनों में शरारत है, फिर भी गहरी शांति,
उनके दर्शन भर से मिट जाती मन की भ्रांति।
पीतांबर की छटा में, प्रेम झलकता अपार,
नन्हे-से कान्हा लगते, यशोदा के राजदुलार।
फूलों की इस बगिया में, खुशियाँ बरसाते हैं,
अपनी मधुर मुस्कान से, सबके मन हरषाते हैं।
जहाँ कदम पड़ें कान्हा के, वहाँ प्रेम खिल जाता है,
सूना-सूना जीवन भी, वृंदावन बन जाता है।
हे नंदलाला! बस इतनी-सी कृपा करना,
मेरे मन के आँगन में भी, यूँ ही सदा बसे रहना।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र











