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अब आसमाँ में तारे नहीं दिखते

अब आसमाँ में तारे नहीं दिखते,
वो ख़ूबसूरत नज़ारे नहीं दिखते।

ध्रुव तारा, सप्त तारे तारों के बीच,
तेरे नाना, मेरे दादा—सारे नहीं दिखते।

टिमटिमाते वो उजाले नहीं दिखते,
अब वो बचपन के उजले हवाले नहीं दिखते।

छत पर लेटकर जो गिनते थे तारों को,
वो रातें, वो किस्से, वो सहारे नहीं दिखते।

शहर की रौशनी ने छीन लिया आसमाँ,
अब चाँद भी पहले-सा प्यारा नहीं दिखता।

तारे तो आज भी वहीं हैं शायद,
बस आँखों में वो बचपन हमारा नहीं दिखता।

अब आसमाँ में तारे नहीं दिखते,
वो ख़ूबसूरत नज़ारे नहीं दिखते।
R S Lostom

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