
मेरा एक वही तो रखवाला है ,
जिनका अहंकार निवाला है ।
देवों के देव शिव महाधिदेव ,
भोले भंडारी शंभू निराला हैं ।।
देवों के देव और देवाधिदेव ,
देव देवियों के जो आला हैं ।
सर्प मोर मूस बिच्छू व नंदी ,
शीश चन्द्र जिसने पाला है ।।
महल न रखते भोले भंडारी ,
झोंपड़ी में जहॅं तहॅं झाला है ।
हर जीव एक दूजे के विरोधी ,
जबकि न कहीं लगे ताला है ।।
मिलकर रहते सारे ही जीव ,
जैसे एक दूजे के ये खाला हैं ।
श्री विष्णु जी के परम पूजारी ,
श्री रामभक्त वही ये बाला हैं ।।
गाॅंजा भाॅंग से नशे में चूर ,
कमर पहने मृगछाला है ।
कानों में तो बिच्छू लटके ,
सर्प गले लगा देखो माला है ।।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।













