
सोने से तो पूरा घर भरा ,
चैन की नींद सो न सका ।
सोना छिना रात में सोना ,
रोते रोते भी रो न सका ।।
चला तो था पुष्प ही बोने ,
शूल भय से बो न सका ।
नहीं खोनेवाला खो दिया ,
खोनेवाला खो न सका ।।
कनक तो एक सनक है ,
कनक जीवन खनक है ।
कनक खनकते खनकते ,
जीवन का होत टनक है ।।
कनक और खनक छोड़ो ,
दोनों जीवन चैन हराम ।
न कुछ लाना न ले जाना ,
दर्शन कर घूमकर धाम ।।
यहाॅं जो उपजाए हैं सोना ,
भर घर का कोना कोना ।
नीचे ऊपर भी भर ले पूरा ,
कर ले खूब तू सोना सोना ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।













