
रिद्धि-सिद्धि के स्वामी बनकर,सुख सम्पदा लुटाते हो।
दुर्वा मोदक तुमको चढ़ता, ज्ञान सुधा बरसाते हो।
शिव नंदन गौरी के लाला, अनुपम रूप तुम्हारा है,
भक्त द्वार पर जो भी आता, उनको तुम अपनाते हो।।
पुंज ज्ञान के बने गजानन, मंद मंद मुस्काते हैं।
हाथ परश अरु पोथी सोहै,माथे तिलक लगाते हो।
गीता की भी विनय सुनो प्रभु,चरणों में मिले ठिकाना,
मेवा मिश्री अर्पित करती, जिसे प्रेम से खाते हो।।
दया धर्म का मूल तुम्ही हो, पावन है धाम तुम्हारा।
मूषक की तुम किए सवारी,घूम रहे हो जग सारा।
एकदंत गज बदन विनायक, शरण तुम्हारी जो भी आए,
कष्ट निवारण उसका करके, देते हो सदा सहारा।।
सारे जग में गणपति बप्पा, होता है जय घोष सदा।
जो भी मन से सुमिरन करता,उसका मिटता दोष सदा।
शरण आपकी मैं आई हूंँ, सिर पर हाथ रखो देवा,
चरणों में जब मिले ठिकाना,उर उपजे संतोष सदा।।
डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश











