
भगवानदास शर्मा “प्रशांत”
शिक्षक सह साहित्यकार
शिक्षक अपने श्रेष्ठ कर्मों से इस आदर्श का प्रतिनिधित्व कर सकता है।” गुरु का आशय भारतीय परंपरा में केवल पढ़ाना नहीं, बल्कि जीवन गढ़ना भी है। शिष्य मैं वह सभी मानवी मूल्य का विकास करना भी है जिनके बल पर वह एक अच्छा नागरिक बन देश के लिए समर्पित रहते हुए अपना जीवन निर्वहन करता है। उपनिषदों में गुरु-शिष्य संबंध को अत्यंत ऊँचा स्थान प्राप्त है। तैत्तिरीय उपनिषद् की शिक्षावली में गुरु अपने शिष्य को निर्देश देता है-
“सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः। आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः।”
और आगे-
“मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव।”
अर्थात् सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो, स्वाध्याय में प्रमाद मत करो और आचार्य का सम्मान करो। यहाँ शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा उत्तीर्ण करना नहीं है। शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण है। गुरु शिष्य को केवल यह नहीं बताता कि क्या सोचना है, बल्कि उसे यह क्षमता देता है कि वह कैसे सोचे,सत्य-असत्य में कैसे अंतर करे और कठिन परिस्थितियों में उचित निर्णय कैसे ले। शिक्षक हमें केवल किताबी ज्ञान को ही नहीं बल्कि हमारे अंदर विद्यमान असीम क्षमताओं को पहचान कर निखारते हैं। हमारे अंदर मूल्यों का समावेश करते है। गुरु हमें अच्छा बनने में मदद करते हैं। शिक्षकों के निरंतर सकारात्मक प्रयासों से विद्यार्थियों की मानसिक विकास होता है। शिक्षक और गुरु शिष्य का संबंध बहुत ही पवित्र और प्राचीन है। हम अगर भक्तिकालीन संतों को देखें तो कबीर, रहीम, रसखान, तुलसी, जायसी,मीरा आदि ने गुरु की महत्ता को समझाया है। हमें इनको पढ़ने की भी जरूरत है हमें अपने शिक्षकों को सदैव आदर करना चाहिए। क्योंकि हम दुनिया के सभी सभी अधूरे हैं और हमें पूर्णता की ओर हमारे शिक्षक ही ले जाते हैं। व्यक्ति के जीवन में शिक्षा और शिक्षक दोनों ही विशेष महत्व रखते है। एक अच्छा शिक्षक बालक के अंदर छुपी प्रतिभा को निखार कर जौहरी की तरह तरास कर हीरा बनाते हैं। आज शिक्षक दिवस पर अगर शिक्षकों की बात होती है। तो देश की पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले का नाम आता है। जिन्होंने बालिका शिक्षा पर विशेष बल दिया था।
भगवानदास शर्मा “प्रशांत”
शिक्षक सह साहित्यकार
इटावा उत्तर प्रदेश













